एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: न्यायालय ने केंद्र, राज्यों से संबंधित लेखकों से खुद को अलग करने को कहा

एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: न्यायालय ने केंद्र, राज्यों से संबंधित लेखकों से खुद को अलग करने को कहा

एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: न्यायालय ने केंद्र, राज्यों से संबंधित लेखकों से खुद को अलग करने को कहा
Modified Date: March 11, 2026 / 07:57 pm IST
Published Date: March 11, 2026 7:57 pm IST

नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्देश दिया कि केंद्र और सभी राज्य सरकारें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में विवादास्पद अध्याय तैयार करने में शामिल तीन विशेषज्ञों से अपना संबंध तोड़ लें।

शीर्ष अदालत ने इस अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर कथित “आपत्तिजनक” सामग्री शामिल किये जाने को लेकर यह सख्ती बरती है।

न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक सप्ताह के भीतर विषय-विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया, ताकि एनसीईआरटी की कानूनी अध्ययन की पाठ्यचर्या को अंतिम रूप दिया जा सके, जो केवल आठवीं कक्षा ही नहीं, बल्कि उच्च कक्षाओं के लिए भी लागू होगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया गया कि यह अध्याय प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की अध्यक्षता में बनी ‘पाठ्यपुस्तक विकास टीम’ द्वारा तैयार किया गया था, जिसमें सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार सदस्य के रूप में शामिल थे।

इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल हैं।

पीठ ने कहा, “प्रारंभ में हमारे पास यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो और उनके सहयोगी सुपर्णा दिवाकर तथा आलोक प्रसन्न कुमार को भारतीय न्यायपालिका के बारे में उचित और पर्याप्त जानकारी नहीं है और/या उन्होंने जानबूझकर तथा सोच-समझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, ताकि आठवीं कक्षा के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की जा सके…।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे ऐसा कोई कारण नहीं दिखाई देता कि इन व्यक्तियों को किसी भी रूप में पाठ्यक्रम तैयार करने या आने वाली पीढ़ी के बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया से जोड़ा जाए।

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों, विश्वविद्यालयों तथा सरकारी धन प्राप्त करने वाले सार्वजनिक संस्थानों को निर्देश दिया कि वे इन तीनों व्यक्तियों से तुरंत खुद को अलग कर लें और उन्हें ऐसी कोई जिम्मेदारी न दें जिसमें पूरी या आंशिक रूप से सार्वजनिक धन खर्च होता हो।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि वे (लेखक) कोई स्पष्टीकरण देना चाहते हैं, तो इस आदेश में संशोधन के लिए वे उच्चतम न्यायालय का रुख कर सकते हैं, और उस स्थिति में यह आदेश अदालत के अधीन रहेगा।

पीठ ने कहा कि एनसीईआरटी के निदेशक द्वारा दायर हलफनामे में व्यक्त इस रुख से भी अदालत ‘समान रूप से चिंतित’ है कि अध्याय को “विधिवत फिर से लिखा गया है”।

अदालत ने कहा, “हम निर्देश देते हैं कि यदि विषय की पाठ्यपुस्तक का अध्याय चार वास्तव में फिर से लिखा गया है, तो उसे तब तक प्रकाशित न किया जाए जब तक कि उसे विषय-विशेषज्ञों की समिति द्वारा मंजूरी न मिल जाए।’’

पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-अधिगम सामग्री समिति (एनएसटीसी) की संरचना पर भी फिर से विचार करना चाहिए, विशेष रूप से उन लोगों के संबंध में, जिनके साथ पाठ्यपुस्तक विकास टीम के सदस्यों द्वारा विवादित अध्याय को डिजिटल रूप से साझा किया गया था।

अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि 26 फरवरी को इस मामले में आदेश पारित करने के बाद तथाकथित सोशल मीडिया पर कुछ तत्वों ने गैर-जिम्मेदाराना ढंग से कार्रवाई और प्रतिक्रियायें दीं।

पीठ ने कहा, “हम दृढ़ता से मानते हैं कि समस्या का सीधे सामना किया जाना चाहिए। इसलिए हम भारत सरकार को निर्देश देते हैं कि ऐसे वेबसाइट और उन्हें चलाने वाले व्यक्तियों की पहचान करे और उनका पूरा विवरण हमें उपलब्ध कराए, ताकि हम उचित कार्रवाई कर सकें।”

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे तत्वों के खिलाफ कानून को अपना काम करने देना चाहिए।

पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे, जिसमें एक पूर्व वरिष्ठ न्यायाधीश ओर एक प्रमुख अकादमिक और एक प्रसिद्ध विधिवेत्ता शामिल हों।

इसने कहा कि यदि विषय-विशेषज्ञों की समिति एनसीईआरटी के कानूनी अध्ययन पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को भी शामिल करती है तो यह सराहनीय काम होगा।

पीठ ने कहा कि यह ‘‘थोड़ा निराशाजनक” है कि यदि एनसीईआरटी न्यायपालिका के बारे में छात्रों को पढ़ाना चाहती थी, तो एक भी प्रमुख न्यायविद को इसमें शामिल नहीं किया गया।

न्यायालय ने कहा, “हालांकि, एनएसटीसी के पुनर्गठन के लिए इसे सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया गया है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का उद्देश्य न्यायपालिका की संस्थागत कार्यप्रणाली की किसी भी स्वस्थ, वस्तुपरक और वैध आलोचना को रोकना नहीं है।

अदालत ने यह नोट किया कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी, ने अध्याय के समावेशन के लिए अपने और एनसीईआरटी की ओर से बिना शर्त और बिना किसी रोक-टोक के माफी पत्र (हलफनामा) दायर किया है।

पीठ ने यह भी नोट किया कि शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव ने भी बिना शर्त और बिना किसी रोक-टोक के माफी पत्र दायर किया है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने एनसीईआरटी से केवल आठवीं कक्षा ही नहीं, बल्कि सभी कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करने के लिए कहा है।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने टिप्पणी की, “इसे एनसीईआरटी को देने के बजाय, हम सराहना करते यदि केंद्र सरकार स्वयं कोई उच्चस्तरीय समिति गठित करती।”

इस पर मेहता ने कहा, “यह किया जाएगा। इसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष विषय-विशेषज्ञ शामिल होंगे।”

एनसीईआरटी निदेशक द्वारा दायर हलफनामे का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा, “यह हलफनामा आंखें खोलने वाला है कि पाठ्यक्रम को किसी भी स्तर पर अनुमोदन प्राप्त किए बिना जारी किया गया।”

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा, “यदि देश में छात्रों के लिए पाठ्यक्रम प्रकाशित करने का यही आकस्मिक तरीका है, तो श्रीमान सॉलिसिटर जनरल, आप हमसे क्या चीज करने की अपेक्षा करते हैं।’’

इस पर तुषार मेहता ने कहा कि इसके लिए “प्रणाली में बदलाव” की आवश्यकता है, जो पहले ही शुरू हो चुका है।

जब पीठ ने कहा कि इन तीन व्यक्तियों से तुरंत खुद को अलग कर लिया जाए, तब मेहता ने कहा, “हमने पहले ही स्वयं कहा है कि हम उन्हें अलग कर रहे हैं।”

पीठ ने पाया कि एनसीईआरटी निदेशक द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि ये व्यक्ति केवल एनसीईआरटी की गतिविधि से ही अलग होंगे, तब सीजेआई ने कहा, “अगर कल उनमें से किसी को उपकुलपति नियुक्त कर दिया जाए तब क्या होगा।’’

उच्चतम न्यायालय ने 26 फरवरी को एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के किसी भी आगे के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल वितरण पर “पूर्ण प्रतिबंध” लगा दिया था, क्योंकि इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री शामिल थी।

अदालत ने कहा कि इसने एक गोली चला दी है और न्यायपालिका का “खून बह रहा” है।

भाषा रंजन सुरेश

सुरेश


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