पनून कश्मीर ने जनगणना में कश्मीरी पंडितों के लिए ‘नरसंहार पीड़ित’ के दर्जे की मांग की
पनून कश्मीर ने जनगणना में कश्मीरी पंडितों के लिए ‘नरसंहार पीड़ित’ के दर्जे की मांग की
श्रीनगर, 17 मई (भाषा) विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन पनून कश्मीर ने जम्मू-कश्मीर में जनगणना 2027 के लिए स्व-गणना प्रक्रिया शुरू होने के बीच सरकार के वर्गीकरण मानदंडों को लेकर गंभीर चिंता जताई और कहा कि उन्हें “प्रवासी” बताने से उनका जबरन विस्थापन स्वैच्छिक पलायन जैसा प्रतीत होता है।
पनून कश्मीर के नए अध्यक्ष टीटो गांजू ने कश्मीरी पंडितों से जुड़ी केंद्र सरकार की नीति की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी में अलग मातृभूमि की मांग से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और दशकों से अपनाई जा रही “लचीली” नीतियों ने समुदाय के विस्थापन को “स्वीकार्य” बना दिया है।
हाल ही में ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत के दौरान गांजू से जब पूछा गया कि उनका संगठन 2027 की जनगणना में नरसंहार वर्गीकरण की मांग क्यों कर रहा है तो उन्होंने कहा, “क्योंकि सब कुछ वहीं से शुरू होता है। यदि हमें ‘प्रवासी’ के रूप में दर्ज किया जाता है, तो जबरन विस्थापन को कानूनी रूप से स्वैच्छिक स्थानांतरण के रूप में पेश किया जाना माना जाएगा। इस एक गड़बड़ी से भविष्य में हर दावा कमजोर होगा।”
उन्होंने कहा, “हम अपेक्षा करते हैं कि हमें आंतरिक रूप से विस्थापित नरसंहार पीड़ितों और नरसंहार से बचे लोगों के रूप में वर्गीकृत किया जाए, कश्मीर घाटी में मूल निवास स्थान से जोड़ा जाए, अलग से गणना की जाए और विस्थापन की अवधि व कारण दर्ज किए जाएं।”
उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के लिए केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे वाली अलग मातृभूमि की पनून कश्मीर की मांग कोई “बहुत बड़ी मांग” नहीं, बल्कि संवैधानिक सुरक्षा के लिहाज से “बहुत छोटी” है।
जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास विभाग के अनुसार, 1990 में आतंकवाद के कारण 59,764 कश्मीरी पंडित परिवारों ने घाटी छोड़ी थी। इनमें से अधिकांश परिवार जम्मू और आसपास के इलाकों में बस गए, जबकि 23,313 परिवार जम्मू-कश्मीर से बाहर के क्षेत्रों में जाकर बस गए।
भाषा जोहेब नरेश
नरेश

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