प्रदूषण बोर्ड अधीनस्थ कानून के बिना पर्यावरण क्षति के लिए जुर्माना नहीं लगा सकते: उच्चतम न्यायालय

प्रदूषण बोर्ड अधीनस्थ कानून के बिना पर्यावरण क्षति के लिए जुर्माना नहीं लगा सकते: उच्चतम न्यायालय

प्रदूषण बोर्ड अधीनस्थ कानून के बिना पर्यावरण क्षति के लिए जुर्माना नहीं लगा सकते: उच्चतम न्यायालय
Modified Date: May 21, 2026 / 08:20 pm IST
Published Date: May 21, 2026 8:20 pm IST

नयी दिल्ली, 21 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधीनस्थ कानून बनाए बिना पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए जुर्माना नहीं लगा सकते।

न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने केंद्र सरकार के इस बयान के बाद यह निर्देश जारी किया कि पर्यावरण संरक्षण से संबंधित कई अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक नया कानून बनाया जा रहा है।

पीठ ने कहा कि यह स्पष्टीकरण आवश्यक है क्योंकि कई उच्च न्यायालयों ने अधीनस्थ कानून के अभाव के आधार पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए जुर्माने की वसूली पर रोक लगा दी है।

पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने बताया कि उच्च स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है और सरकार एक नया कानून बनाने पर विचार कर रही है।

याचिकाकर्ता दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि नियमों के अभाव में किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए।

पीठ इस मामले में अगली सुनवाई 10 अगस्त को करेगी। पीठ ने पिछले वर्ष चार अगस्त के उस फैसले को ध्यान में रखा, जिसमें यह माना गया था कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जल एवं वायु अधिनियम की धारा 33ए और 31ए के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए संभावित पर्यावरणीय क्षति के लिए पूर्व-उपाय के रूप में निश्चित धनराशि वसूल कर सकते हैं या बैंक गारंटी देने के लिए कह सकते हैं।

पिछले वर्ष चार अगस्त को पीठ ने कहा कि जल एवं वायु अधिनियम की धारा 33ए और 31ए के तहत पूर्व-उपाय के रूप में क्षतिपूर्ति लगाने या वसूल करने की शक्ति या बैंक गारंटी देने की जरूरत को अधीनस्थ कानून में प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों को शामिल करते हुए सिद्धांत और प्रक्रिया का विस्तृत विवरण देने के बाद ही लागू किया जाएगा।

न्यायालय ने कहा था कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के पास प्रदूषण फैलाने वाली संस्था के विरुद्ध उचित कार्रवाई तय करने की शक्ति और विवेक होना चाहिए।

भाषा संतोष रंजन

रंजन

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