लद्दाख में भारत का पहला पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क तैयार करने की कवायद तेज

लद्दाख में भारत का पहला पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क तैयार करने की कवायद तेज

लद्दाख में भारत का पहला पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क तैयार करने की कवायद तेज
Modified Date: June 29, 2026 / 08:39 pm IST
Published Date: June 29, 2026 8:39 pm IST

लेह, 29 जून (भाषा) लद्दाख में भारत के पहले पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क की स्थापना का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि संरक्षण की सावधानीपूर्वक प्रक्रिया के तहत अब तक लद्दाख के संवेदनशील स्थलों से 31 प्राचीन शैल चित्रों (पेट्रोग्लिफ) को स्थानांतरित किया जा चुका है।

लोक भवन के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह लद्दाख की अमूल्य पुरातात्विक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर 18 अप्रैल को उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क की आधारशिला रखी थी। यह पार्क सदियों पुराने शैल चित्रों के संरक्षण के लिए एक समर्पित केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। ये शैल चित्र प्राकृतिक क्षरण, अनियंत्रित पर्यटन, बुनियादी ढांचा विकास, मानवीय हस्तक्षेप और जागरूकता की कमी के कारण खतरे में हैं।

लेह के सिंधु घाट में बन रहे इस पार्क में केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न दूरस्थ और संवेदनशील स्थानों से एकत्र किए गए शैल चित्रों को रखा जाएगा। इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए इनका संरक्षण करना सुनिश्चित होगा और पर्यटक भी इन्हें व्यवस्थित एवं शैक्षणिक वातावरण में देख सकेंगे।

पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क का निर्माण इस वर्ष सितंबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रवक्ता ने बताया कि अब तक साबू थांग से 31 शैल चित्रों को संरक्षण पार्क में स्थानांतरित किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि इन शैल चित्रों का आकार चार फुट से लेकर 17 फुट तक की परिधि में है और इनका वजन 500 किलोग्राम से लेकर 10 टन तक है।

अधिकारियों के अनुसार, इन शैल चित्रों में मुख्य रूप से लद्दाख के विशिष्ट वन्यजीवों जैसे आइबेक्स, याक, अर्गली, नीली भेड़, कुत्ते और अन्य जीवों के चित्र उकेरे गए हैं। इसके अलावा इनमें शिकार, शिकारी, योद्धाओं, पैरों के निशान और अन्य प्रतीकात्मक चित्र भी शामिल हैं। आइबेक्स जंगली पहाड़ी बकरों की एक प्रजाति है।

इन शैल चित्रों का वितरण लद्दाख की पारिस्थितिक विविधता को भी दर्शाता है। शैम और पुरिग की निचली घाटियों में आइबेक्स के चित्र अधिक मिलते हैं, जबकि चांगथांग के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में याक और अर्गली के चित्र प्रमुख हैं।

प्रवक्ता ने बताया कि संरक्षण कार्य के पहले चरण में कुल 155 शैल चित्रों को स्थानांतरित किया जाएगा। इनमें फ्यांग थांग से 13, स्टाकमो थांग से 30, लिकिर हिल से 28, लिकिर थांग से 14 और तारू थांग से 10 शैल चित्र शामिल हैं। इसके अलावा थिकसे, इगू, गंगला, खलत्से, सासपोल, रणबीरपुर, निमू, स्पितुक, त्सोगस्ती और कई अन्य स्थानों से भी शैल चित्र लाए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि इन अमूल्य पुरावशेषों को सिंधु घाट में सावधानीपूर्वक स्थानांतरित कर संरक्षित किया जा रहा है। साथ ही, शोध, शिक्षा और आम लोगों के लिए इन्हें सुलभ बनाने के उद्देश्य से एक व्याख्या केंद्र भी स्थापित किया जाएगा।

उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने एक बयान में कहा, ‘‘पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क लद्दाख की अमूल्य पुरातात्विक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की एक ऐतिहासिक पहल है। संवेदनशील शैल चित्रों को वैज्ञानिक तरीके से संचालित संरक्षण पार्क में स्थानांतरित कर हम प्राकृतिक क्षरण और मानवीय गतिविधियों से भारत की सभ्यतागत विरासत के एक महत्वपूर्ण अध्याय की रक्षा कर रहे हैं।’’

भाषा रवि कांत दिलीप

दिलीप


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