निजी स्कूलों में हर साल शुल्क वृद्धि पर रोक के लिए पारदर्शी नियामक बनाने की राज्यसभा में उठी मांग

निजी स्कूलों में हर साल शुल्क वृद्धि पर रोक के लिए पारदर्शी नियामक बनाने की राज्यसभा में उठी मांग

निजी स्कूलों में हर साल शुल्क वृद्धि पर रोक के लिए पारदर्शी नियामक बनाने की राज्यसभा में उठी मांग
Modified Date: March 23, 2026 / 04:40 pm IST
Published Date: March 23, 2026 4:40 pm IST

नयी दिल्ली, 23 मार्च (भाषा) राज्यसभा में सोमवार को कांग्रेस सांसद रजनी अशोकराव पाटिल ने निजी स्कूलों की बढ़ती फीस पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है और उन्होंने सरकार से फीस वृद्धि पर सख्त रुख अपनाते हुए एक पारदर्शी नियामक बनाने की मांग की।

राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए पाटिल ने कहा कि देशभर के निजी स्कूलों में अनियंत्रित और लगातार बढ़ती फीस संरचना मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों पर असहनीय दबाव डाल रही है।

उन्होंने कहा, “शिक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। लेकिन आज कई अभिभावकों के लिए तथाकथित अच्छे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना आर्थिक बोझ बन गया है, जो कई बार संकट की स्थिति तक पहुंच जाता है।”

पाटिल ने आरोप लगाया कि निजी स्कूल हर साल मनमाने तरीके से फीस बढ़ाते हैं, अक्सर बिना पारदर्शिता या उचित कारण के।

उन्होंने कहा कि ट्यूशन फीस के अलावा अभिभावकों से विकास शुल्क, गतिविधि शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क जैसे कई अतिरिक्त शुल्क लिए जाते हैं और उन्हें महंगी दरों पर स्कूल से, निर्धारित विक्रेताओं से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।

उन्होंने कहा, “यह शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को दर्शाता है, जो हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।”

पाटिल ने कहा कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में समावेशिता की भावना कमजोर हो रही है और शेष 75 प्रतिशत अभिभावकों पर अनियंत्रित आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।

उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों ने फीस नियमन के लिए कानून बनाए हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर और असंगत है।

कांग्रेस सांसद ने स्कूल फीस पर एक मजबूत, पारदर्शी और समान नियामक ढांचा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने सरकार से फीस वृद्धि पर सख्त नियंत्रण, स्कूलों की वित्तीय व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता, छिपे और अनिवार्य शुल्कों पर रोक लगाने तथा अभिभावकों और छात्रों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

उन्होंने कहा, “यदि अभी कार्रवाई नहीं की गई, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कुछ लोगों का विशेषाधिकार बन जाएगी, न कि हर बच्चे का अधिकार। शिक्षा सशक्त बनाने का माध्यम होनी चाहिए, परिवारों को आर्थिक रूप से कमजोर करने का नहीं।”

भाषा मनीषा अविनाश

अविनाश


लेखक के बारे में