एसआईआर में बंगाल की मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

एसआईआर में बंगाल की मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

एसआईआर में बंगाल की मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार
Modified Date: April 13, 2026 / 05:03 pm IST
Published Date: April 13, 2026 5:03 pm IST

नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ 13 लोगों द्वारा दायर याचिका पर सोमवार को सुनवाई से इनकार कर दिया।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान 23 अप्रैल को होगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका को ‘‘समय पूर्व’’ करार देते हुए पीड़ित पक्षों को स्थापित अपीलीय न्यायाधिकरणों से संपर्क करने का निर्देश दिया।

इसने कहा, ‘‘चूंकि याचिकाकर्ता (कुरैशा यास्मीन और अन्य) पहले ही अपीलीय न्यायाधिकरणों से संपर्क कर चुके हैं… हमारी राय में, याचिका में व्यक्त आशंकाएं समय पूर्व हैं।’’

पीठ ने यह भी कहा कि उसने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि निर्वाचन आयोग ने उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमाने ढंग से नाम हटाए हैं, और इसके खिलाफ दायर अपील पर समय पर सुनवाई नहीं की जा रही।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ अपील पर निर्णय लेने के लिए उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 न्यायाधिकरणों का गठन किया है।

निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी एस नायडू ने अदालत को सूचित किया कि वर्तमान में लगभग 30 से 34 लाख अपील लंबित हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘प्रत्येक न्यायाधिकरण के पास अब निपटाने के लिए एक लाख से अधिक अपील हैं।’’

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग संबंधित न्यायिक अधिकारियों के समक्ष आवश्यक आदेश प्रस्तुत करने में विफल रहा है और मतदाता सूची के लिए ‘‘अंतिम तिथि’’ को बढ़ाया जाना चाहिए।

वकील ने कहा, ‘‘अगर मुझे बहस करने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो फिर इसका क्या फायदा? क्या इन अपील का फैसला एक निश्चित समयसीमा के भीतर होगा या इन्हें बस आगे बढ़ाया जाता रहेगा?’’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने चुनावी प्रक्रिया की शुचिता का जिक्र करते हुए कहा कि मतदान का अधिकार केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का एक ‘‘भावनात्मक’’ स्तंभ है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां वोट देने का अधिकार न केवल संवैधानिक है, बल्कि भावनात्मक भी है। यह लोकतंत्र का हिस्सा होने और सरकार चुनने में मदद करने से जुड़ा है।’’

हालांकि, उन्होंने कहा कि पूर्व न्यायाधीशों वाले न्यायाधिकरणों पर निर्णयों के लिए समयसीमा निर्धारित करके अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें उचित प्रक्रिया के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। मतदाता को दो संवैधानिक प्राधिकरणों के बीच फंसा हुआ नहीं होना चाहिए।’’ उन्होंने यह भी कहा कि इस स्तर पर चुनाव प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी।

न्यायमूर्ति बागची ने उल्लेख किया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपील की प्रक्रिया और प्रारूप पहले ही तैयार कर लिया था, जिसकी सोमवार से शुरुआत हो गई।

पीठ ने कहा, ‘‘जब तक बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदान से बाहर नहीं कर दिया जाता या इससे चुनाव पर महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता… तब तक चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता।’’ इसने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य ‘‘चुनावों को बढ़ावा देना है, न कि उन्हें रोकना।’’

प्रधान न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ताओं को अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष अपने सभी कानूनी उपायों का उपयोग करना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होगा तथा मतों की गिनती चार मई को होगी।

भाषा

नेत्रपाल दिलीप

दिलीप


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