उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने यूएपीए के अत्यधिक इस्तेमाल पर चिंता जताई
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने यूएपीए के अत्यधिक इस्तेमाल पर चिंता जताई
नयी दिल्ली/बेंगलुरु, 23 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां ने कहा है कि असहमति को अपराध घोषित करने, आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के तहत अंधाधुंध गिरफ्तारियों और ‘‘गहरी सामाजिक दरारों’’ के माध्यम से 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है।
रविवार को बेंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति भुइयां ने उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस व्यक्त किया। उन्होंने इसकी तुलना देश भर में जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के पदों पर 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की नियुक्ति से की।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा ‘लेकिन क्या संवैधानिक अदालतों में भी यही प्रणाली लागू हुई है? सवाल यही है। यहीं पर कॉलेजियम प्रणाली की जांच पड़ताल का महत्व सामने आता है। ऐसा क्यों है कि जब मूल्यांकन व्यक्तिपरक हो जाता है, तो महिलाएं उस स्तर तक नहीं पहुंच पातीं?’’
उन्होंने कहा, ‘‘1950 से अब तक उच्चतम न्यायालय के 287 न्यायाधीशों में से कुल मिलाकर केवल 11 महिला न्यायाधीश रही हैं। ऐसा क्यों? फातिमा बीवी से लेकर अब न्यायमूर्ति नागरत्ना तक, यह आंकड़ा लगभग दो प्रतिशत है।’
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के व्यक्तिपरक मूल्यांकन मानदंडों के अनुसार, बहुत कम लोगों का ही उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में चयन होता है।
गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के इस्तेमाल के संबंध में गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने 2019 से 2023 तक के आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि सही मायने में विकसित राष्ट्र को राजनीतिक नारों के बजाय संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘यूएपीए के तहत कम दोषसिद्धि दर कानून के दुरुपयोग को नहीं तो अत्यधिक उपयोग को दर्शाती है।’ यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों के 2019 से 2023 तक के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग पांच प्रतिशत है।
न्यायाधीश ने कहा, “इससे लगातार कम दोषसिद्धि दर दिखती है। इससे क्या संकेत मिलता है? दुरुपयोग नहीं, तो अत्यधिक इस्तेमाल का, और आपराधिक न्याय प्रणाली पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? इससे अदालतों पर कितना बोझ पड़ता है? इससे पता चलता है कि अधिकांश लोगों को गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सका। इससे संकेत मिलता है कि कई गिरफ्तारियां समय से पहले और पर्याप्त सबूतों के अभाव में की गईं।”
उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों में उनकी संख्या केवल 14 प्रतिशत है। उन्होंने कहा, ’25 उच्च न्यायालयों में से केवल दो में महिला मुख्य न्यायाधीश हैं- गुजरात और मेघालय। एक महीने में एक और महिला मुख्य न्यायाधीश बन जाएंगी। यह भी बेहद अपर्याप्त है, 25 उच्च न्यायालयों में से केवल तीन।’
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे शोध से पता चलता है कि जब भी भर्ती प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ होती है, तो न्यायिक क्षेत्र में अधिक महिलाएं प्रवेश करती हैं। जब भारत एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत 2047) बनेगा, तब न्यायपालिका में लैंगिक प्रतिनिधित्व में अधिक समानता होनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ऐसा स्थान होना चाहिए, जो वास्तव में देश की विविधता को दर्शाए।’’
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि विकसित देशों में बहस और असहमति के लिए अधिक गुंजाइश होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘बहस को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। विभिन्न विचारों के प्रति अधिक सहिष्णुता होनी चाहिए। भिन्न विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए। विभिन्न विचारों और आलोचनाओं के प्रति अधिक सहिष्णुता होनी चाहिए।’’
सामाजिक असंतुलनों पर उन्होंने कहा, ‘‘गहरी सामाजिक दरारें मौजूद हैं। विकसित भारत ऐसी दरारों को बर्दाश्त नहीं कर सकता।’’
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘माता-पिता यह ज़िद नहीं कर सकते कि उनके बच्चे दलित महिला द्वारा बनाया गया खाना न खाएं। यह विकसित भारत का मॉडल नहीं हो सकता। हम विकसित भारत की कल्पना तब नहीं कर सकते, जब दलित लोगों को गलियारों में खड़ा किया जाए और उन पर पेशाब किया जाए। यह विकास का मॉडल नहीं हो सकता। व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की जानी चाहिए।”
भाषा आशीष दिलीप
दिलीप

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