गुजरात के चिड़ियाघरों में भैंसों के वध के खिलाफ याचिका पर न्यायालय का हस्तक्षेप से इनकार

गुजरात के चिड़ियाघरों में भैंसों के वध के खिलाफ याचिका पर न्यायालय का हस्तक्षेप से इनकार

गुजरात के चिड़ियाघरों में भैंसों के वध के खिलाफ याचिका पर न्यायालय का हस्तक्षेप से इनकार
Modified Date: May 18, 2026 / 05:56 pm IST
Published Date: May 18, 2026 5:56 pm IST

नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गुजरात के दो चिड़ियाघरों में जंगली जानवरों को खिलाने के लिए परिसर के भीतर भैंसों के वध को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज करने के उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से सोमवार को इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि पशु का वध किसी वाणिज्यिक या व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए नहीं किया जा रहा है। पीठ ने यह टिप्पणी याचिकाकर्ता एनजीओ ‘एनिमल वेलफेयर फाउंडेशन’ द्वारा यह दलील देने के बाद की कि चिड़ियाघर परिसर में पशुओं का वध बूचड़ख़ाना संचालित करने के समान है और कानूनों का अनुपालन आवश्यक है।

न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, “ये सभी नियम बूचड़ख़ानों के लिए हैं, जहां वध मानव उपभोग या वाणिज्यिक उद्देश्य से किया जाता है। उन्हें चिड़ियाघर का प्रबंधन जैसा वे चाहें, करने दें…।”

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने दलील दी कि भले ही यह वध गैर-वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए हो, फिर भी चिड़ियाघर परिसर में पशुओं के वध का नियमन आवश्यक है।

उन्होंने कहा, “चिड़ियाघर परिसर में किसी भी पशु का वध नियंत्रित होना चाहिए। केवल इसलिए कि यह गैर-वाणिज्यिक उद्देश्य से किया जा रहा है, नियम समाप्त नहीं हो जाते। देश में कहीं भी ऐसी प्रथा नहीं है।”

गोयल ने उच्चतम न्यायालय के 2017 के कॉमन कॉज बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस मामले में दिए गए निर्देशों के बाद सरकार ने वध-पूर्व, वध और वध-उपरांत चरणों से जुड़े 24 नियमों की पहचान की थी।

उन्होंने दलील दी कि 24 नियमों में से केवल एक नियम ही लागू नहीं हो सकता, क्योंकि मांस मानव उपभोग के लिए नहीं है, लेकिन शेष सभी नियम अब भी लागू होंगे।

गोयल ने कहा कि भारत के अन्य चिड़ियाघरों में प्रसंस्कृत मांस या भोजन की आपूर्ति के लिए निविदाएं जारी की जाती हैं, जबकि गुजरात के इन दो चिड़ियाघरों में जीवित भैंसों को परिसर में लाकर उनका वध किया जाता है और फिर उसका उपयोग कैद में रखे गए जंगली जानवरों को खिलाने के लिए किया जाता है।

उन्होंने कहा, “जब किसी पशु का वध होता है तो प्रदूषण और जल पर प्रभाव पड़ता है… यह केवल गुजरात के इन दो चिड़ियाघरों में होता है, जहां जीवित पशुओं को लाकर परिसर में ही उनका वध किया जाता है और फिर उपयोगी भाग निकालकर बाकी हटा दिया जाता है।”

उन्होंने यह भी दलील दी कि चिड़ियाघर परिसर में पशुओं का वध बूचड़खाना संचालन के समान है और इसलिए कानूनों का अनुपालन जरूरी है, जिसमें पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और लाइसेंसिंग आवश्यकताएं शामिल हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत इस दलील से सहमत नहीं है।

गत 29 जनवरी को गुजरात उच्च न्यायालय ने जूनागढ़ के सक्करबाग प्राणी उद्यान परिसर में टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त ठेकेदार द्वारा भैंसों के प्रबंधन और वध को चुनौती देने वाली एनजीओ की जनहित याचिका खारिज कर दी थी।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चिड़ियाघर में कोई मान्यता प्राप्त बूचड़खाना नहीं है और पशुओं का वध अवैध एवं अनियमित तरीके से किया जा रहा है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि चिड़ियाघर प्राधिकारियों ने कानूनी नोटिस के जवाब में बताया था कि चिड़ियाघर का संचालन वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा बनाए गए नियमों के तहत होता है।

चिड़ियाघर प्राधिकरण ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा था कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक नियम, 2011 इस मामले में लागू नहीं होते क्योंकि मांस मानव या वाणिज्यिक उपभोग के लिए नहीं है।

भाषा अमित मनीषा

मनीषा


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