न्यायालय विधि छात्रों की उपस्थिति पर उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा

न्यायालय विधि छात्रों की उपस्थिति पर उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा

न्यायालय विधि छात्रों की उपस्थिति पर उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा
Modified Date: May 13, 2026 / 08:37 pm IST
Published Date: May 13, 2026 8:37 pm IST

नयी दिल्ली, 13 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि कोई भी विधि कॉलेज या विश्वविद्यालय न्यूनतम उपस्थिति की कमी के कारण छात्रों को परीक्षा में बैठने से नहीं रोक सकता।

न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने टिप्पणी की कि यदि इस तरह की स्थिति को स्वीकार कर लिया जाता है, तो राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय और विधि कॉलेजों के छात्रावास ‘‘महज भोजन और आवास सुविधाएं’’ बनकर रह जाएंगे।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के 3 नवंबर के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि वह मामले की सुनवाई करेगी और फैसला सुनाएगी।

पीठ ने भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें बीसीआई को अनिवार्य उपस्थिति मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए भी कहा गया था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि उसका दृढ़ मत है कि सामान्य रूप से शिक्षा और विशेष रूप से विधि शिक्षा के लिए उपस्थिति के मानदंडों को इतना कठोर नहीं बनाया जा सकता कि वे मानसिक आघात का कारण बनें, छात्र की मृत्यु की तो बात ही छोड़ दें।

इसने यह फैसला उच्चतम न्यायालय द्वारा शुरू की गई और उच्च न्यायालय में स्थानांतरित की गई एक स्वतः संज्ञान याचिका का निपटारा करते हुए सुनाया था, जो 2016 में कानून के छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या से संबंधित थी, जिसे कथित तौर पर आवश्यक उपस्थिति की कमी के कारण सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया था।

कानून के तीसरे वर्ष के छात्र रोहिल्ला ने 10 अगस्त, 2016 को अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आरोप था कि कॉलेज ने आवश्यक उपस्थिति न होने के कारण उसे सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा था और लिखा था कि वह असफल है और जीना नहीं चाहता।

उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम, 2023 के तहत सभी शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए शिकायत निवारण समितियों (जीआरसी) का गठन करना अनिवार्य होगा।

यह उल्लेख करते हुए कि जीआरसी छात्रों के हितों की रक्षा के लिए हैं, जिसमें उनका मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है, उच्च न्यायालय ने यूजीसी को परामर्श शुरू करने और यूजीसी नियमों में संशोधन पर विचार करने का निर्देश दिया था।

इसने कहा था, ‘‘बीसीआई भारत में तीन वर्षीय और पांच वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रमों के लिए अनिवार्य उपस्थिति मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन करेगा।’’

उच्च न्यायालय ने कहा था कि बीसीआई को उपस्थिति मानदंडों में संशोधन को शामिल करना चाहिए, ताकि ‘मूट कोर्ट’, सेमिनार, मॉडल संसद, वाद-विवाद और अदालती सुनवाई में भाग लेने को भी महत्व दिया जा सके।

इसने यह भी कहा था कि किसी भी विधि महाविद्यालय, विश्वविद्यालय या संस्थान को विधि शिक्षा नियमों के तहत बीसीआई द्वारा निर्धारित न्यूनतम प्रतिशत से ऊपर उपस्थिति मानदंड अनिवार्य करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

भाषा

नेत्रपाल नरेश

नरेश


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