उप्र : अदालत ने कॉलेज के गेट पर 30 दिनों तक खड़ा रहने की सजा वाले निर्देश को पलटा

उप्र : अदालत ने कॉलेज के गेट पर 30 दिनों तक खड़ा रहने की सजा वाले निर्देश को पलटा

उप्र : अदालत ने कॉलेज के गेट पर 30 दिनों तक खड़ा रहने की सजा वाले निर्देश को पलटा
Modified Date: February 7, 2026 / 03:40 pm IST
Published Date: February 7, 2026 3:40 pm IST

प्रयागराज, सात फरवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एकल पीठ के उस विवादास्पद निर्देश को दरकिनार कर दिया है जिसमें नोएडा के एक विश्वविद्यालय के छात्र को एक तख्ती लेकर कॉलेज के गेट पर 30 दिनों तक खड़ा रहने का आदेश दिया गया था।

“मैं कभी किसी लड़की से छेड़खानी नहीं करूंगा” लिखी तख्ती के साथ छात्र को 30 दिनों तक कॉलेज के गेट पर खड़ा रहने का आदेश दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने हर्ष अवाना की ओर से दायर एक याचिका को यह कहते हुए निस्तारित कर दिया कि यह आदेश “अनुचित” और “अपमानजनक” था तथा इससे उसके चरित्र पर एक “अमिट दाग” लग जाएगा।

एक अन्य संस्थान की छात्राओं के साथ छेड़खानी के आरोपों के बाद नोएडा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा उक्त छात्र को मार्च, 2023 में निष्कासित कर दिया गया था।

इसके बाद, छात्र ने उच्च न्यायालय में इस निष्कासन को चुनौती दी और 29 अक्टूबर, 2025 को न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने निष्कासन के आदेश को रद्द कर दिया, लेकिन साथ ही छात्र को विश्वविद्यालय में पुन: दाखिला देने के लिए कई सख्त शर्तें लगा दीं।

इन शर्तों में उक्त शर्त भी शामिल थी जिसके तहत छात्र को कॉलेज के गेट पर तीन नवंबर, 2025 से लगातार 30 दिनों तक सुबह 8:45 से 9:15 बजे तक एक तख्ती लेकर खड़ा रहना था। विश्वविद्यालय को इसकी फोटोग्राफ लेने का निर्देश दिया गया था और इस शर्त का अनुपालन नहीं करने की स्थिति में छात्र को फिर से निष्कासित करने की विश्वविद्यालय को छूट दी गई थी।

इस विशेष निर्देश को चुनौती देते हुए छात्र के अधिवक्ता ने खंडपीठ के समक्ष दलील दी कि यह दंड अत्यधिक अपमानित करने वाला है और इसका छात्र के भविष्य पर एक निरंतर, हानिकारक प्रभाव पड़ेगा।

पीठ ने चार फरवरी, 2026 को दिए आदेश में कहा, “हमारा दृढ़तापूर्वक यह मत है कि उक्त निर्देश की प्रकृति किसी भी परिस्थितियों में उचित नहीं है। इस प्रकृति का निर्देश न केवल अपमानजनक है, बल्कि इसका अपीलकर्ता के चरित्र पर एक अमिट दाग लगेगा।”

भाषा

सं, राजेंद्र नेत्रपाल रवि कांत


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