पासपोर्ट धोखाधड़ी मामले में महिला बरी, अदालत ने वैवाहिक विवाद में कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई

पासपोर्ट धोखाधड़ी मामले में महिला बरी, अदालत ने वैवाहिक विवाद में कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई

पासपोर्ट धोखाधड़ी मामले में महिला बरी, अदालत ने वैवाहिक विवाद में कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई
Modified Date: April 1, 2026 / 08:01 pm IST
Published Date: April 1, 2026 8:01 pm IST

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने बेटे के पासपोर्ट के लिए आवेदन करते समय जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के आरोप में फंसी एक महिला को बरी कर दिया।

अदालत ने कहा कि इस कृत्य में अपराध जैसा प्रतीत नहीं होता है।

अदालत ने वैवाहिक विवाद में बदला लेने के लिए अदालत में आपराधिक आरोप तय करने के खिलाफ भी चेतावनी दी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह आरोपी मिथिला मुरादा द्वारा पांच जून, 2025 को एक मजिस्ट्रेट अदालत के दिये आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

मजिस्ट्रेट अदालत ने आदेश में मिथिला मुरादा पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 466 (अदालत के अभिलेख या सार्वजनिक रजिस्टर की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत आरोप तय किए गए थे।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी महिला अपने पति से अलग रह रही है और उसने इस अलग रहने की अवधि के दौरान अपने बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था।

महिला ने हालांकि बच्चे के आधिकारिक नाम ‘नूर बाली’ के बजाय ‘नूर मुरादा’ नाम से पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था।

आरोप है कि पासपोर्ट कार्यालय में अपॉइंटमेंट के दिन आरोपी महिला ने अधिकारियों को एक जाली जन्म प्रमाण पत्र दिखाया, जिसमें केवल ‘नूर’ नाम लिखा हुआ था जबकि मूल प्रमाण पत्र में ‘नूर बाली’ नाम था।

न्यायाधीश ने कहा, “अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले को अगर स्वीकार भी कर लिया जाए तो ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने कथित जाली दस्तावेज बनाया था। न ही किसी अनुचित लाभ या हानि का खुलासा हुआ है और न ही ऐसा कोई प्रमाण है जिससे प्रथम दृष्टया यह अनुमान लगाया जा सके कि दस्तावेज जाली था।”

अदालत ने 28 मार्च को अपने आदेश में कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना विधि का दुरुपयोग होगा और आधारभूत प्रमाणों के अभाव में याचिकाकर्ता को अनुचित मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।

अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत के विवादित आदेश को भी रद्द कर दिया।

अदालत ने अलग हुए जीवनसाथी से हिसाब बराबर करने के लिए आपराधिक कार्यवाही का दुरुपयोग करने के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा, “इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कार्यवाही वैवाहिक कलह की पृष्ठभूमि में होती है। आपराधिक कानून को वैवाहिक विवादों में अपना हिसाब बराबर करने का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।’’

भाषा जितेंद्र रंजन

रंजन


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