क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है: न्यायालय

क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है: न्यायालय

क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है: न्यायालय
Modified Date: April 21, 2026 / 03:18 pm IST
Published Date: April 21, 2026 3:18 pm IST

नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को शबरिमला अयप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है।

शीर्ष न्यायालय की यह टिप्पणी मुख्य पुजारी के उस बयान के बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब कोई श्रद्धालु पूजा के लिए मंदिर जाता है तो यह किसी देवता की विशेषताओं के विरोध में नहीं हो सकता।

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न आस्थाओं को मानने वाले लोगों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है।

पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायाधीश एमएम सुंदरेश, न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्ला, न्यायाधीश अरविंद कुमार, न्यायाधीश ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायाधीश प्रसन्ना बी वराले, न्यायाधीश आर महादेवन और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

‘तंत्री’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने कहा कि किसी भी मंदिर में संपन्न होने वाले समारोहों और अनुष्ठानों की प्रकृति धर्म का अभिन्न अंग है और इसलिए यह एक धार्मिक प्रथा है।

उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रथा का जारी रहना, जो एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है, पूजा के अधिकार का एक हिस्सा होगा जो धर्म या धार्मिक संप्रदाय में विश्वास रखने वाले प्रत्येक सदस्य के लिए है।

गिरि ने कहा, ‘‘जब कोई भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो वह देवता के गुणों के विरुद्ध नहीं जा सकता, क्योंकि उसका उद्देश्य देवता की पूजा करना है। भक्त देवता में निहित दिव्य ओज के प्रति समर्पण करता है। उसे देवता के मूल गुणों को स्वीकार करना होता है।’’

न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने प्रश्न किया, ‘‘जब मैं किसी मंदिर में जाता हूं, तो मेरी मूल मान्यता यह होती है कि वह भगवान है, वह मेरा सृष्टिकर्ता है, उसने मुझे बनाया है, है ना?’’

न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा, ‘‘ मैं वहां शत प्रतिशत आस्था के साथ जाता हूं। मैं पूरी तरह समर्पित हूं, मेरे हृदय में कोई अशुद्धता नहीं है। और वहां मुझे बताया जाता है कि जन्म, वंश या किसी विशेष परिस्थिति के कारण, आपको देवता को छूने की अनुमति नहीं है। अब, क्या संविधान मेरी मदद नहीं करेगा?’’

उन्होंने कहा कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि में कोई अंतर नहीं हो सकता।

इस पर गिरि ने उत्तर दिया कि यदि किसी के पुजारी बनने पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो इसका ध्यान या तो अनुच्छेद 25(2)(बी) कानून द्वारा रखा जाए या इसका ध्यान स्वयं राज्य द्वारा रखा जाए।

उन्होंने कहा, ‘‘ यदि पुजारी का अर्थ वह व्यक्ति है जिसे शास्त्रों में पूजा-अर्चना करने और देवता की आराधना करने का निर्देश दिया गया है, यदि किसी व्यक्ति के जन्म के आधार पर पुजारी बनने और फिर ‘सेवा’ करने पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो इसका समाधान या तो अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत कानून बनाकर किया जाएगा या राज्य द्वारा स्वयं किया जाएगा।’

मामले में सुनवाई जारी है।

भाषा शोभना नरेश

नरेश


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