मातृत्व और गठिया से लड़कर कांस्य तक पहुंचीं सीमा कालीरमण
मातृत्व और गठिया से लड़कर कांस्य तक पहुंचीं सीमा कालीरमण
… अपराजिता उपाध्याय …
ग्लास्गो, 31 जुलाई (भाषा) किसी खिलाड़ी के लिए मातृत्व के बाद खेल में वापसी को सबसे कठिन चुनौतियों में गिना जाता है लेकिन भारतीय चक्का फेंक और राष्ट्रमंडल खेलों की कांस्य पदक विजेता सीमा कालीरमण के लिए असली संघर्ष मां बनने के बाद शुरू हुआ। साल 2022 में बेटे रुद्र के जन्म के कुछ ही सप्ताह बाद सीमा गठिया (आर्थराइटिस) की गंभीर बीमारी की चपेट में आ गईं। इस सूजन संबंधी रोग ने उनके उन जोड़ों को प्रभावित किया, जिन पर चक्का फेंक खिलाड़ी की पूरी निर्भरता रहती है। हालत ऐसी हो गई कि रोजमर्रा की वस्तुएं उठाना भी मुश्किल था, एक किलोग्राम वजनी डिस्क फेंकना तो दूर की बात थी। उन्होंने हालांकि चार साल बाद शानदार वापसी करते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक हासिल कर अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया। इस 27 साल की खिलाड़ी ने पीटीआई से कहा, ‘‘ गर्भावस्था के बाद मुझे गठिया हो गया था, जिससे कई तरह की परेशानियां सामने आईं।” उनकी वापसी का सफर आसान नहीं था। उनके पति रविंदर कालीरमण इस कठिन दौर में उनके कोच भी बने। रविंदर खुद राष्ट्रीय चैंपियन रहे हैं और चोटों के कारण उनका करियर समय से पहले समाप्त हो गया था। रविंदर ने कहा, ‘‘हमें इस बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हमने काफी शोध किया और आयुर्वेद का भी सहारा लिया, क्योंकि इसका स्थायी इलाज नहीं है, केवल इसे नियंत्रित किया जा सकता है।’’ बीमारी से उबरने के लिए सीमा और उनके साथ रविंदर ने भी जीवनशैली और खानपान में बड़े बदलाव किए। रविंदर ने बताया, “उन्हें इमली और नींबू जैसी खट्टी चीजों से परहेज करना पड़ा। आहार में ऐसी चीजें शामिल की गईं जो उनके लिए लाभकारी थीं। उनके सभी जोड़ों में दर्द रहता था। वह कोई सामान तक नहीं उठा पाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने फिर से अभ्यास शुरू किया।’’ यह प्रगति मीटरों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कदमों में दर्ज हुई। मातृत्व से पहले सीमा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 48.08 मीटर था। उन्होंने 2024 में प्रतिस्पर्धी खेलों में वापसी की और इस वर्ष ‘इंडियन चैंपियनशिप’ में 59.73 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। ग्लास्गो में 58.65 मीटर का थ्रो कर कांस्य पदक अपने नाम किया। शारीरिक मजबूती पर काम करने के साथ-साथ सीमा ने भिवानी स्थित चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय से शारीरिक शिक्षा में पीएचडी भी जारी रखी। उन्होंने कहा, “मेरा शोध भी ‘कल्पना और अभिव्यक्ति’ पर आधारित है। सकारात्मक और नकारात्मक सोच खिलाड़ी के प्रदर्शन को किस तरह प्रभावित करती है, यही इसका विषय है।” मातृत्व ने उनके जीवन को खेल के बाहर भी पूरी तरह बदल दिया। सीमा ने कहा, “मेरा बेटा अब बड़ा हो रहा है। वह हमारे साथ रहना चाहता है। यह काफी कठिन होता है।” स्कॉटलैंड रवाना होने से पहले बेटे रुद्र ने उनसे सिर्फ एक ही फरमाइश की थी। सीमा मुस्कुराते हुए बताती हैं, “उसने कहा था, ‘मम्मी, मेरे लिए एक पदक लेकर आना।’ उसके लिए वही सबसे बड़ा खिलौना है।” पूर्व बास्केटबॉल खिलाड़ी और भाला फेंक एथलीट रहे तथा भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके पिता की बेटी सीमा ने खेल, शोध और मातृत्व की जिम्मेदारियों को एक साथ निभा रही हैं। इसके बावजूद उनके पास आज भी कोई सरकारी नौकरी नहीं है। सीमा ने कहा, “मेरे पास कोई नौकरी नहीं है।” भाषा आनन्द नमितानमिता

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