लखनऊ में बढ़ रहे उमस भरी गर्मी के दिन, सिंधु-गंगा के मैदानों में ‘हीट रिस्क’ को मिल रहा नया आकार
लखनऊ में बढ़ रहे उमस भरी गर्मी के दिन, सिंधु-गंगा के मैदानों में 'हीट रिस्क' को मिल रहा नया आकार
लखनऊ, 26 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ दिन-ब-दिन एक नए तरीके के ‘हीट स्ट्रेस’ से जूझ रही है। एक ऐसी मुश्किल स्थिति, जिसमें चढ़ता तापमान बढ़ती उमस के साथ जुड़कर शहर के लोगों को ऐसी गर्मी का एहसास करा रहा है, जिसे किसी थर्मोमीटर से नहीं नापा जा सकता।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के वर्ष 2015 से 2024 के बीच मौसम से संबंधित दैनिक डेटा के विश्लेषण में आगाह किया गया है कि अगर उमस भरी गर्मी के हालात इसी तरह विकट होते रहे तो वर्ष 2050 तक लखनऊ में हर साल ऐसी गर्मी से 4000 लोगों की मौत होगी।
भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉक्टर के. जे. रमेश ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ खासकर सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में नमी के स्तर में भी अपेक्षाकृत काफी इजाफा हुआ है।
उन्होंने कहा, ‘लखनऊ सिंधु-गंगा के मैदानों के बीचो-बीच बसा है। इस इलाके की कम ऊंचाई और बेसिन जैसी भौगोलिक बनावट के चलते हवा ठहरी रहने की वजह से नमी बरकरार रहती है। नमी का ऊंचा स्तर उमस भरी गर्मी के असर को और बढ़ा देता है जिससे सेहत से संबंधित जोखिम खासकर सांस और गर्मी से जुड़ी बीमारियां बढ़ जाती हैं।’
सीईईडब्ल्यू के वर्ष 2015 से 2024 के बीच मौसम से संबंधित दैनिक डेटा के विश्लेषण की रिपोर्ट से पता लगता है कि इस दौरान लखनऊ के लोगों ने गर्मी और भीषण उमस भरे 289 दिन काटे हैं और इन दिनों में अधिकतम तापमान कम से कम 35 डिग्री सेल्सियस और उमस का स्तर 60 फीसद या उससे ज्यादा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह रुख लगातार एक हकीकत बनता जा रहा है क्योंकि वर्ष 2015 से 2019 के बीच लखनऊ में उमस भरी गर्मी वाले 123 दिन रिकॉर्ड किए गए और इस तरह से इन पांच वर्षों के दौरान इनका सालाना औसत 24.6 दिन रहा वहीं, वर्ष 2020 से 2024 के दौरान यह संख्या 123 से बढ़कर 166 हो गई जिनमें से 2020 में सबसे ज्यादा 45 दिन भीषण गर्मी और उमस भरे रहे। इससे यह जाहिर होता है कि उमस भरी गर्मी वाले दिन लगातार बढ़ रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ज्यादा उत्सर्जन वाले हालात में लखनऊ में सभी आयु वर्गों के लोगों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों की संख्या में लगभग 50% की बढ़ोत्तरी होगी। नतीजतन प्रति हजार लोगों पर गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों का प्रतिशत 0.6 तक पहुंच जाएगा और नगरीय विस्तार को ध्यान में रखते हुए इसका मतलब है कि लखनऊ में हर साल गर्मी से लगभग 4000 लोगों की मौत होगी।
वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक सीमा जावेद ने बताया कि ज्यादा उमस की वजह से पसीने के जरिए शरीर को खुद को ठंडा रखने की क्षमता कम हो जाती है जिससे ज्यादा तापमान वाले गर्मी के दिनों के मुकाबले कम तापमान होने पर भी हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने बताया कि उमस भरी रातों की वजह से शरीर की रात भर में होने वाली क्षतिपूर्ति भी कम हो जाती है, जिससे खासतौर पर खुले में काम करने वाले कामगारों तथा बुजुर्गों बच्चों एवं गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
जावेद ने बताया कि अब लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि गर्मियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। उमस भरी गर्मी के दुष्प्रभावों से बचाव के लिए सरकारी नीतियों में व्यापक बदलाव के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी कार्य करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि उमस भरी गर्मी से तबीयत खराब होने पर छांव भरी हवादार जगह में बैठना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इसके अलावा और भी कई छोटे-छोटे उपाय हैं जिनसे उमस भरी गर्मी के दुष्प्रभावों से काफी हद तक बचा जा सकता है।
नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनआरडीसी) इंडिया में जलवायु अनुकूलनशीलता एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अभियंता तिवारी ने कहा, ‘लखनऊ में गर्मी से जुड़े जोखिम पर चढ़ते पारे, नमी और लगातार गर्म रहने वाली रातों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।’
उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 से 2019 और 2020 से 2024 के बीच गर्मी तथा उमस वाले दिनों में हुई 35 फीसद की वृद्धि खासतौर पर फिक्र पैदा करती है, क्योंकि ज्यादा नमी के कारण पसीना नहीं सूखता है और पसीना सूखने से मिलने वाली ठंडक कम हो जाती है, वहीं गर्म रातों की वजह से दिन की गर्मी से शरीर को उबरने में परेशानी होती है।
तिवारी ने कहा कि अब तरजीह इस बात को दी जानी चाहिए कि इन प्रमाणों के आधार पर ठोस कदम उठाए जाएं, अधिक हरियाली वाली शहरी योजना, मजबूत ‘हीट एक्शन प्लान’ और कमजोर तबकों के लिए खास सुरक्षा उपायों के जरिए ऐसे क्षेत्र बनाना जरूरी हो जाएगा जो बदलते मौसम का सामना कर सकें।
भाषा सलीम
मनीषा
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