अंतरिक्ष में हुई जबरदस्त टक्कर से खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी गुत्थी को सुलझाने के नये सुराग मिले

अंतरिक्ष में हुई जबरदस्त टक्कर से खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी गुत्थी को सुलझाने के नये सुराग मिले

अंतरिक्ष में हुई जबरदस्त टक्कर से खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी गुत्थी को सुलझाने के नये सुराग मिले
Modified Date: June 30, 2026 / 04:36 pm IST
Published Date: June 30, 2026 4:36 pm IST

(केली गोर्डजी, सीएसआईआरओ)

कैनबरा (आस्ट्रेलिया), 30 जून (द कन्वरसेशन) ब्लैक होल के बाद, न्यूट्रॉन तारे — जो बहुत ही घने तारे के अवशेष होते हैं — ब्रह्मांड की सबसे घनी वस्तुएं हैं। जब न्यूट्रॉन तारे आपस में टकराते हैं, तो वे अंतरिक्ष में ऐसी लहरें पैदा करते हैं, जिन्हें हम धरती पर महसूस कर सकते हैं।

फिर हम इन लहरों का इस्तेमाल ब्रह्मांड की सबसे बुनियादी, लेकिन मुश्किल से समझ आने वाली विशेषताओं में से एक को मापने के लिए कर सकते हैं — कि यह कितनी तेजी से फैल रहा है। इसे ‘हब्बल कॉन्स्टेंट’ (माप की वह इकाई जो उस दर को बताती है, जिस गति से ब्रह्मांड फैल रहा है) कहा जाता है, और वैज्ञानिक दशकों से इस पर काम और विचार-विमर्श कर रहे हैं।

हाल के वर्षों में यह बहस तेज हो गई है। विभिन्न तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले वैज्ञानिकों को अलग-अलग जवाब मिल रहे हैं। ‘हब्बल टेंशन’ के नाम से जानी जाने वाली यह बढ़ती समस्या आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गई है।

‘द एस्ट्रोफिजिकल पत्रिका’ में प्रकाशित एक अध्ययन में, हमने ‘हब्बल कॉन्स्टेंट’ का सटीक मान पता लगाने के लिए एक नया तरीका अपनाया है। इसके लिए, हमने दो न्यूट्रॉन तारों की जबरदस्त टक्कर से पैदा हुई गुरुत्वीय तरंगों की दोबारा जांच की।

हमारा मानना ​​है कि हमारे नतीजे गुरुत्वीय तरंग पद्धति का इस्तेमाल करके ‘हब्बल कॉन्स्टेंट’ का अब तक का सबसे सटीक माप बताते हैं।

हमें हब्बल कॉन्स्टेंट की क्या जरूरत है?

खगोलविदों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि ब्रह्मांड कितनी तेजी से फैल रहा है। इससे हमारे आकलन के लिए ब्रह्मांडीय पैमाना तय होता है, जिससे हम खगोलीय वस्तुओं की सही दूरी और आकार का पता लगा पाते हैं। इससे भी अहम बात यह है कि इससे हमें यह पता चलता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई और इसका अंत कैसे हो सकता है।

इसकी अहमियत को देखते हुए, हम कई तरीकों से हब्बल कॉन्स्टेंट को मापने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रह्मांड के विकास के मानक सिद्धांत के अनुसार, सभी तरीकों से एक ही नतीजा मिलना चाहिए।

कई वर्षों तक, अलग-अलग तरीकों के नतीजे मोटे तौर पर एक जैसे ही रहे, लेकिन उनमें त्रुटि की गुंजाइश काफी ज्यादा थी। पिछले कुछ दशकों में, खगोलविदों ने सटीकता बढ़ाने और अनिश्चितता को कम करने की दिशा में काफी तरक्की की है।

कुछ टीमों ने ‘बिग बैंग’ (ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके विस्तार को समझने का सबसे प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धांत) से बचे हुए प्रकाश का इस्तेमाल करके सटीक माप हासिल किए। इस तरीके को ‘‘दूर के ब्रह्मांड’’ का इस्तेमाल करने वाला तरीका कहा जाता है, क्योंकि यह प्रकाश हम तक पहुंचने के लिए लगभग पूरे ब्रह्मांड की उम्र के बराबर समय तक यात्रा कर चुकी है।

दूसरी टीम ने अपनी सटीक माप लेने के लिए बहुत पास की चीजों, जैसे कि ‘पल्सेटिंग’ तारों और सुपरनोवा से आने वाली रोशनी का इस्तेमाल किया। इन्हें ‘पास के ब्रह्मांड’ की माप कहा जाता है।

‘पल्सेटिंग’ तारे एक बहुत अधिक चुंबकीय, बेहद घना और घूमता हुआ न्यूट्रॉन तारा, जो अपने चुंबकीय ध्रुव से विद्युत चुंबकीय विकिरण की किरणें निकालता है।

हैरानी की बात है कि बहुत सटीक माप के ये दो सेट एक-दूसरे से मेल नहीं खाते – और इनमें काफी अंतर है। दूर के ब्रह्मांड के माप के अनुसार, हब्बल कॉन्स्टेंट 67–68 किलोमीटर प्रति सेकंड प्रति मेगापार्सेक (खगोलीय दूरी की एक बहुत बड़ी इकाई: 32.6 लाख प्रकाश वर्ष) है। पास के ब्रह्मांड का परिणाम बहुत अधिक है – लगभग 72–74 किमी/सेकंड प्रति मेगापार्सेक।

इसे ही ‘हब्बल टेंशन’ कहते हैं।

इसका क्या मतलब है? क्या ऐसा हो सकता है कि दोनों में से किसी एक या दोनों ही तरीकों में कुछ गड़बड़ हो गई हो? बहुत बारीकी से जांच-पड़ताल के बावजूद, किसी ने कोई त्रुटि नहीं पाई। या फिर, ब्रह्मांड के विकास को लेकर हमारी समझ में कोई बुनियादी कमी हो सकती है और इसे सुलझाने के लिए हमें ‘‘नयी भौतिकी’’ की जरूरत है।

इस ब्रह्मांडीय गुत्थी को सुलझाने के लिए, हब्बल कॉन्स्टेंट को मापने के नये और स्वतंत्र तरीकों की बहुत जरूरत है।

गुरुत्वीय तरंगों का आगमन:

गुरुत्वीय तरंगें ब्रह्मांड के विस्तार को मापने का एक पूरी तरह से स्वतंत्र तरीका देती हैं। स्पेस-टाइम (अंतरिक्ष-समय) के ताने-बाने में ये बड़ी लहरें तब पैदा होती हैं, जब बहुत घनी वस्तुएं — जैसे कि ब्लैक होल — आपस में टकराती हैं।

न्यूट्रॉन तारे उन तारों के घने अवशेष होते हैं, जो सुपरनोवा के रूप में विस्फोट हुए थे, लेकिन बाद में ब्लैक होल में तब्दील होने के लिए इतने भारी नहीं थे कि ऐसा हो पाता। एक दशक से कुछ अधिक समय पहले, आपस में टकराते हुए ब्लैक होल से पहली बार गुरुत्वीय तरंगों का पता चला था।

हमें क्या पता चला:

अपने नये अध्ययन में, हमें पहले किये गए विश्लेषण को बेहतर बनाने के कई तरीके मिले। इनमें अधिक बेहतरीन मॉडल, बेहतर सांख्यकीय तकनीकें और अनिश्चितता की मुख्य वजहों पर सावधानी से ध्यान देना शामिल है।

बाद में, अधिक बारीकी से दोबारा विश्लेषण करने पर, हमें पता चला कि पहले के अध्ययन में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले मॉडल डेटा से मेल नहीं खा पा रहे थे।

दिलचस्प बात यह है कि हमारे नतीजे, आस-पास के ब्रह्मांड पर आधारित मापों की तुलना में दूर के ब्रह्मांड से मिले मापों से अधिक मेल खाते हैं — जबकि हमारा तरीका भी आस-पास के ब्रह्मांड पर ही निर्भर करता है।

इससे पता चलता है कि शायद ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ में कोई समस्या नहीं है। इसके बजाय, यह अंतर शायद उन बारीक समस्याओं की वजह से हो सकता है, जो आस-पास के ब्रह्मांड से जुड़े दूसरे तरीकों को प्रभावित करती हैं।

हमारा नतीजा अभी भी आस-पास के ब्रह्मांड की सबसे सटीक मापों की तुलना में चार गुना कम सटीक है। गुरुत्वीय तरंगों का इस्तेमाल करके ‘हब्बल टेंशन’ की गुत्थी को सुलझाने के लिए हमें न्यूट्रॉन तारे की और टक्करों का पता लगाना होगा। ऐसी घटनाएं बहुत कम होती हैं, इसलिए इसमें कुछ समय लग सकता है — लेकिन फिलहाल, हमारा अध्ययन खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक के बारे में एक अहम नया सुराग मुहैया कराता है।

(द कन्वरसेशन) सुभाष दिलीप

दिलीप


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