पृथ्वी के शुरुआती इतिहास का नया रहस्य : क्षुद्रग्रहों की टक्करों ने ही गढ़ी महाद्वीपों की नींव
पृथ्वी के शुरुआती इतिहास का नया रहस्य : क्षुद्रग्रहों की टक्करों ने ही गढ़ी महाद्वीपों की नींव
(टिम जॉनसन, कर्टिन विश्वविद्यालय, और क्रेग ओ’नील, क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय)
पर्थ, 29 जून (द कन्वरसेशन) जब भी किसी विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने की कल्पना की जाती है, तो सबसे पहले विनाश का दृश्य सामने आता है-भीषण टक्कर, आग का विशाल गोला, धूल और मलबे का गुबार तथा उसके बाद वर्षों तक वातावरण में फैला असंतुलन।
लेकिन पृथ्वी के आरंभिक इतिहास में इन टक्करों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव शायद सतह पर बने गड्ढे या तत्काल हुए विनाश से कहीं अधिक गहरा था। संभव है कि इन टक्करों से उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा पृथ्वी के भीतर गहराई तक पहुंची और उसी ने ग्रह के विकास की दिशा तय की।
हमारे नए अध्ययन में यह तर्क दिया गया है कि पृथ्वी के इतिहास के शुरुआती 50 करोड़ वर्षों-जिसे ‘हेडियन ईऑन’ कहा जाता है, उसके वैज्ञानिक मॉडलों में टक्कर से पैदा हुई इस दीर्घकालिक ऊष्मा के प्रभाव को बहुत कम करके आंका गया है।
शोध के अनुसार, बार-बार होने वाली विशाल टक्करों ने केवल पृथ्वी की सतह को क्षणिक रूप से प्रभावित नहीं किया, बल्कि उसकी प्रारंभिक सतह (प्रोटोक्रस्ट) को लंबे समय तक अत्यधिक गर्म, कमजोर और भूगर्भीय दृष्टि से अस्थिर बनाए रखा।
पृथ्वी के शुरुआती इतिहास की सबसे बड़ी पहेली—
‘हेडियन ईऑन’ काल आज भी भू-विज्ञान की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक है। सूक्ष्म जिरकॉन क्रिस्टलों से पता चलता है कि पृथ्वी की सतह के कुछ हिस्से 4.3 अरब वर्ष से भी अधिक पुराने हैं और उस समय पृथ्वी पर पानी भी मौजूद था।
इसके बावजूद उस काल की लगभग कोई भी चट्टान आज सुरक्षित नहीं बची है। अब तक मिली सबसे पुरानी महाद्वीपीय चट्टानों की आयु लगभग 4.03 अरब वर्ष मानी जाती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि इन दोनों अवधियों के बीच के लगभग 27 करोड़ वर्षों में आखिर पृथ्वी पर क्या हुआ?
केवल सतही नहीं थीं ये टक्करें—
आमतौर पर विशाल क्षुद्रग्रहों की टक्करों को केवल सतही घटनाएं माना जाता है, लेकिन चंद्रमा की सतह आज भी इस बात का प्रमाण है कि सौरमंडल के शुरुआती दौर में ऐसी टक्करें कितनी सामान्य थीं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर इन टक्करों की तीव्रता चंद्रमा की तुलना में कहीं अधिक रही होगी। इन टक्करों से उत्पन्न अपार ऊर्जा केवल सतह तक सीमित नहीं रही, बल्कि पृथ्वी के भीतर तक पहुंच गई।
कंप्यूटर मॉडलिंग से पता चला है कि ‘हेडियन ईऑन’ काल के अधिकांश समय में क्षुद्रग्रहों से उत्पन्न ऊष्मा पृथ्वी के आंतरिक स्रोतों से बनने वाली ऊष्मा से कहीं अधिक थी।
पृथ्वी का आंतरिक ढांचा भी बदला—
यह प्रभाव केवल सतह की चट्टानों को गर्म करने तक सीमित नहीं था।
विशाल टक्करों ने पृथ्वी की प्रारंभिक सतह (क्रस्ट) को पतला किया, कई स्थानों पर उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया और उसके नीचे स्थित मैंटल को पिघला दिया। इसके परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में बेसाल्टिक मैग्मा का निर्माण हुआ।
सबसे बड़ी टक्करों से मैंटल तक पहुंची ऊष्मा ने करोड़ों वर्षों तक ज्वालामुखीय गतिविधियों और विवर्तनिक (टेक्टोनिक) प्रक्रियाओं को प्रभावित किया।
आज की पृथ्वी जैसी नहीं थी शुरुआती पृथ्वी—
कुछ वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि प्रारंभिक पृथ्वी आज की पृथ्वी से बहुत अलग नहीं थी और संभवतः उस समय भी प्लेट विवर्तनिकी किसी न किसी रूप में सक्रिय थी।
लेकिन नए अध्ययन के निष्कर्ष बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं।
यदि क्षुद्रग्रह लगातार इतनी अधिक ऊष्मा पहुंचा रहे थे, तो पृथ्वी की प्रारंभिक सतह बेहद पतली, कमजोर और कम गहराई पर ही आंशिक रूप से पिघली हुई रही होगी। अर्थात पृथ्वी की बाहरी सतह बार-बार नष्ट होती और फिर नए सिरे से बनती रहती थी।
महाद्वीप बनने में भी निभाई अहम भूमिका—
पहली नजर में ऐसा लगता है कि लगातार होने वाली ये टक्करें महाद्वीपों के निर्माण के लिए बाधा रही होंगी, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अंततः इन्हीं प्रक्रियाओं ने महाद्वीपों की नींव रखी।
विशाल टक्करों से पृथ्वी की प्रारंभिक सतह में दरारें पड़ीं, जिससे लंबे समय तक पानी भीतर तक पहुंचता रहा और सतह के निकट मौजूद चट्टानों की रासायनिक संरचना बदलती गई।
साथ ही, मैंटल के पिघलने से भारी मात्रा में मैग्मा उत्पन्न हुआ, जो सतह के भीतर और ऊपर तक पहुंचा।
बार-बार दोहराई गई इन प्रक्रियाओं के कारण पृथ्वी की सतह पर सिलिका की मात्रा बढ़ती गई। यही सिलिका आज महाद्वीपीय पपड़ी की हल्के रंग वाली चट्टानों की प्रमुख विशेषता है।
शुरुआती चट्टानें क्यों नहीं बचीं?—
यह अध्ययन इस रहस्य का भी उत्तर देता है कि ‘हेडियन ईऑन’ काल की चट्टानें लगभग पूरी तरह क्यों गायब हैं।
यदि पृथ्वी की सतह लगातार गर्म होती रही, पिघलती रही और बार-बार पुनर्निर्मित होती रही, तो स्वाभाविक है कि उस समय की अधिकांश प्रारंभिक चट्टानें नष्ट हो गई होंगी।
3.9 अरब वर्ष पहले क्या बदला?—
चंद्रमा पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग 3.9 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के भीतरी हिस्से में विशाल क्षुद्रग्रहों की बमबारी में उल्लेखनीय कमी आने लगी थी। यही वह समय भी है जब पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर महाद्वीपीय सतह सुरक्षित रूप से संरक्षित मिलनी शुरू होती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह महज संयोग नहीं हो सकता। जब लगातार होने वाली टक्करें कम हुईं, तब पृथ्वी की सतह को ठंडी होने, ठोस बनने और मोटी होने का पर्याप्त समय मिला। संभवतः तभी स्थायी महाद्वीपों का विकास संभव हो पाया।
पृथ्वी के विकास को नए नजरिये से देखने की जरूरत—
शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका अध्ययन हेडियन काल से जुड़ी सभी बहसों का अंतिम उत्तर नहीं है, लेकिन इतना अवश्य स्पष्ट करता है कि पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास को समझने के लिए क्षुद्रग्रहों की टक्करों और उनसे उत्पन्न ऊष्मा की भूमिका को गंभीरता से लेना होगा।
यदि यह निष्कर्ष सही है, तो युवा पृथ्वी केवल क्षुद्रग्रहों की चोटों से घायल नहीं हुई थी, बल्कि उन्हीं टक्करों ने उसे नया स्वरूप दिया था। संभवतः पृथ्वी के पहले स्थायी महाद्वीप तभी अस्तित्व में आ सके, जब अंतरिक्ष से होने वाली यह भीषण बमबारी धीरे-धीरे कम होने लगी।
द कन्वरसेशन रवि कांत रवि कांत नरेश
नरेश

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