कमर पतली दिखाने का दावा करती है ‘रिब कॉन्टूरिंग’ सर्जरी, लेकिन क्या बताता है यह चलन

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कमर पतली दिखाने का दावा करती है ‘रिब कॉन्टूरिंग’ सर्जरी, लेकिन क्या बताता है यह चलन

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  • Publish Date - September 13, 2026 / 10:20 AM IST,
    Updated On - September 13, 2026 / 10:20 AM IST

(विवियन लुइस, यूनिवर्सिटी ऑफ कैनबरा)

कैनबरा, 13 सितंबर (द कन्वरसेशन) सोशल मीडिया पर खूबसूरत दिखने की चाह अब सिर्फ ‘मेकअप’, ‘हेयरस्टाइल’ या फिटनेस तक सीमित नहीं रह गई है। शरीर के आकार को बदलने वाली कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं भी सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ रही हैं। ऐसी ही एक प्रक्रिया है ‘रिब कॉन्टूरिंग’, जिसमें निचली पसलियों की स्थिति में बदलाव कर कमर को अधिक पतला दिखाने की कोशिश की जाती है।

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर इस प्रक्रिया को लेकर अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। इस तरह हमारे सोशल मीडिया ‘फीड’ में ऐसी कॉस्मेटिक प्रक्रिया भी पहुंच रही है, जिसके बारे में शायद हमारे में से बहुत से लोगों ने कुछ समय पहले तक सुना भी नहीं था।

शरीर को लेकर लोगों की सोच ( बॉडी इमेज) और खान-पान संबंधी मानसिक विकारों पर विशेषज्ञता रखने ‘क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट’ के तौर पर मेरी दिलचस्पी सिर्फ इस प्रक्रिया में नहीं है। असल सवाल यह है कि हमारे मन में अपने शरीर और सुंदरता को लेकर ये धारणाएं आखिर बनती कैसे हैं?

‘रिब कॉन्टूरिंग’ प्रक्रिया में कमर को अधिक पतला दिखाने के लिए निचली पसलियों में नियंत्रित तरीके से फ्रैक्चर किया जाता है और फिर उन्हें नयी स्थिति में व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रक्रिया में पसलियों को हटाया नहीं जाता, बल्कि उनकी स्थिति में बदलाव किया जाता है।

यह प्रक्रिया सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हो रहे ‘लुक्समैक्सिंग’ नामक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है। आसान शब्दों में कहें तो लुक्समैक्सिंग का मतलब है- अपनी शारीरिक सुंदरता और आकर्षण को अधिकतम करने की कोशिश।

इसके लिए कोई अपने बालों का स्टाइल बदल सकता है, त्वचा की देखभाल का तरीका बदल सकता है या अपने व्यायाम की दिनचर्या में बदलाव कर सकता है लेकिन यह चलन अब कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं और सर्जरी तक भी पहुंच गया है।

रिब कॉन्टूरिंग भले ही नया चलन हो, लेकिन बहुत पतली कमर की चाह नयी नहीं है। सदियों से महिलाओं को अपने शरीर की बनावट बदलने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है।

कमर को कसकर पतला दिखाने वाले ‘कॉर्सेट’ (एक तरह का कसा हुआ, शरीर से चिपककर पहनने वाला परिधान) इसका एक उदाहरण हैं। वहीं 1950 के दशक की मर्लिन मुनरो जैसी अभिनेत्रियों से जुड़ी ‘आवरग्लास फिगर’ भी एक दौर में खूबसूरती का आदर्श मानी जाती थी।

फैशन के साथ शरीर को लेकर सुंदरता के मानक समय के साथ बदलते रहे हैं, लेकिन महिलाओं को अपनी खूबसूरती और शरीर पर लगातार काम करते रहने का संदेश कोई नया नहीं है।

सोशल मीडिया ने बस इतना किया है कि इन संदेशों को हमारी जिंदगी में पहले से कहीं ज्यादा बार पहुंचा दिया है और शरीर को लेकर नए-नए चलन को बेहद तेजी से फैला दिया है।

सोशल मीडिया पर बार-बार ऐसी सामग्री के संपर्क में आना, जिनमें खूबसूरती और शरीर को लेकर ‘आदर्श मानक’ पेश किए जाते हैं, लोगों को इन मानकों को अपनाने के लिए प्रभावित कर सकता है। इससे अपने रूप-रंग को लेकर चिंता बढ़ने के साथ-साथ कॉस्मेटिक सर्जरी कराने पर विचार करने की संभावना भी बढ़ सकती है।

इन्फ्लुएंसर इस पूरी तस्वीर में एक और चीज जोड़ते हैं। वे पारंपरिक सेलिब्रिटी की तुलना में हमें अपने जैसे ज्यादा लगते हैं।

हम उन्हें सोशल मीडिया पर कपड़े पहनते, व्यायाम करते और खाना खाते देखते हैं। वे अपने शयनकक्ष और रसोईघर से हमसे बात करते हैं। इसलिए जब हमारे द्वारा ‘फॉलो’ किया जाने वाला कोई व्यक्ति अपने शरीर या रूप-रंग में बदलाव करता है, तो हमें भी वैसा करना ज्यादा सामान्य और संभव लग सकता है।

यह हमें दूसरों से अपनी तुलना करने के लिए प्रेरित करता है :

हमारे रूप-रंग पर केंद्रित सोशल मीडिया सामग्री हमें अनजाने में अपनी तुलना दूसरे लोगों से करने के लिए भी प्रेरित करती है।

मसलन, सोशल मीडिया पर खूबसूरती से जुड़ी सामग्री को लगातार देखने या उसमें रुचि लेने से लोग अक्सर अपनी तुलना उन लोगों से करने लगते हैं, जिन्हें वे खुद से ज्यादा खूबसूरत मानते हैं। ऐसी तुलना के कारण उनके मन में अपने रूप-रंग को लेकर असंतोष बढ़ सकता है और वे कॉस्मेटिक सर्जरी कराने के बारे में अधिक गंभीरता से सोच सकते हैं।

अक्सर यह तुलना बहुत सूक्ष्म तरीके से होती है। हम किसी दूसरे व्यक्ति की कमर देखते हैं और अचानक हमें अपनी कमर पर ध्यान जाने लगता है। शरीर का कोई ऐसा हिस्सा, जिसके बारे में हमने पहले कभी ज्यादा सोचा तक नहीं था, अचानक हमारी नजर में आ जाता है और हम उसे जांचने-परखने लगते हैं।

रिब कॉन्टूरिंग मुझे इसलिए खास तौर पर सोचने पर मजबूर करती है कि अभी तक शायद ही हममें से किसी ने अपनी पसलियों को खूबसूरती से जुड़ी किसी कमी के रूप में देखा होगा लेकिन जैसे ही हमें पता चलता है कि शरीर के इस हिस्से को भी बदला जा सकता है, हम अनायास अपने शरीर को नए नजरिए से देखने लगते हैं और फिर यह सवाल भी उठ सकता है कि क्या हमारी पसलियों को भी बदलने की जरूरत है?

प्रयोगों में यह पाया गया है कि सोशल मीडिया पर ‘इन्फ्लुएंसर’ की रूप-रंग पर केंद्रित सामग्री देखने के बाद महिलाओं में अपने शरीर को लेकर संतुष्टि कम हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रिब कॉन्टूरिंग या किसी अन्य कॉस्मेटिक प्रक्रिया पर विचार करने वाले व्यक्ति को हमें गलत ठहराना चाहिए।

वयस्कों को अपने शरीर को लेकर फैसले लेने का अधिकार है। अपने रूप-रंग में कोई बदलाव चाहना अपने आप में खराब ‘बॉडी इमेज’ या किसी मानसिक बीमारी का संकेत नहीं है।

ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल शायद यह नहीं है कि कोई व्यक्ति रिब कॉन्टूरिंग क्यों कराना चाहता है, बल्कि यह है कि उस फैसले के पीछे क्या चल रहा है?

इन दोनों बातों में काफी अंतर है – ‘‘मैं चाहता/चाहती हूं कि मेरी कमर थोड़ी अलग दिखे।’’ और ‘‘अगर मेरी कमर अलग दिखने लगेगी, तभी मैं अपने बारे में अच्छा महसूस कर पाऊंगा/पाऊंगी।’’

क्या वास्तव में शरीर का वह बदलाव हमारी भावनात्मक परेशानियों को दूर कर देगा? क्या यह उम्मीद वास्तविक है?

कुछ गंभीर मामलों में व्यक्ति अपने रूप-रंग में किसी कथित कमी को लेकर लगातार परेशान रह सकता है। यह ‘बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर’ का एक लक्षण हो सकता है।

यह मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं कराने वाले लोगों में सामान्य आबादी की तुलना में अधिक पाई जाती है। इसी तरह बॉडी इमेज से जुड़ी परेशानियां खान-पान संबंधी मानसिक विकारों से जूझ रहे लोगों में भी देखने को मिल सकती हैं।

अगर आपका कोई करीबी ऐसी सर्जरी कराने के बारे में सोच रहा हो तो ऐसी स्थिति में तुरंत यह कहने से बचें : ‘‘यह तो बिल्कुल बेवकूफी है।’’ ‘‘तुम्हें इसकी कोई जरूरत नहीं है।’’ या यहां तक कि ‘‘लेकिन तुम तो बहुत खूबसूरत हो।’’

इन बातों के पीछे चिंता और प्यार हो सकता है, लेकिन ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने वाले को आगे बात करने से रोक सकती हैं। इसके बजाय जिज्ञासा दिखाइए। पूछिए कि उसे ऐसा करने का विचार कैसे आया। वह अपने शरीर को लेकर कब से ऐसा महसूस कर रहा है। वह सर्जरी के बाद किस बदलाव की उम्मीद कर रहा है।

यह भी पूछें कि वह सोशल मीडिया पर क्या देख रहा है। क्या किसी इन्फ्लुएंसर या किसी खास सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने शरीर को देखने का उसका नजरिया बदल दिया है?

यह देखना भी जरूरी है कि कहीं शरीर को लेकर चिंता धीरे-धीरे उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को तो प्रभावित नहीं करने लगी है।

हममें से ज्यादातर लोग अपने शरीर या रूप-रंग की कुछ चीजों में बदलाव करना पसंद करेंगे। इसमें कुछ गलत नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने शरीर के साथ सहज होकर जी सकें और यह महसूस न करें कि जब तक हमारा शरीर किसी तय आदर्श जैसा नहीं दिखता, तब तक हम अपने बारे में अच्छा महसूस नहीं कर सकते।

हो सकता है रिब कॉन्टूरिंग का चलन कुछ समय बाद खत्म हो जाए और ‘लुक्समैक्सिंग’ का कोई नया चलन उसकी जगह ले ले लेकिन जब हमारा कोई करीबी अपने रूप-रंग में बड़ा बदलाव करना चाहता है, तो जरूरी नहीं कि हम उसे बताएं कि उसे क्या करना चाहिए।

हम उसकी मदद इस तरह कर सकते हैं कि वह फैसला लेने की रफ्तार थोड़ी धीमी करे, समझे कि यह इच्छा कहां से आई है और खुद से यह सवाल पूछे कि वह वास्तव में क्या बदलना चाहता है।

क्योंकि कई बार असली सवाल यह नहीं होता कि हम अपने शरीर में क्या बदलना चाहते हैं, बल्कि यह होता है कि उस बदलाव से हम अपनी जिंदगी में क्या बदल जाने की उम्मीद कर रहे हैं।

द कन्वरसेशन गोला सिम्मी

सिम्मी