दूरस्थ ग्रहों पर जीवन के संकेत उत्साहजनक, लेकिन पुष्टि में लग सकते हैं कई बरस

दूरस्थ ग्रहों पर जीवन के संकेत उत्साहजनक, लेकिन पुष्टि में लग सकते हैं कई बरस

दूरस्थ ग्रहों पर जीवन के संकेत उत्साहजनक, लेकिन पुष्टि में लग सकते हैं कई बरस
Modified Date: April 28, 2026 / 01:05 pm IST
Published Date: April 28, 2026 1:05 pm IST

( ओलिविया हार्पर विल्किन्स, डिकिन्सन कॉलेज )

कार्लिस्ले (अमेरिका), 28 अप्रैल (द कन्वरसेशन) दूरस्थ ग्रहों पर जीवन के संभावित संकेतों की खोज भले ही रोमांचक प्रतीत होती हो, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए इन संकेतों की पुष्टि करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें कई वर्ष भी लग सकते हैं।

खगोलशास्त्री दूरबीनों की मदद से ग्रहों के वायुमंडल, तारामंडल की धूल और गैस के विशाल बादलों (नेबुला) तथा आकाशगंगाओं में मौजूद विशिष्ट अणुओं का अध्ययन करते हैं। ये बादल तारों के जन्मस्थल भी होते हैं और अंतरिक्ष के रासायनिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने अब तक लगभग एक सदी के भीतर अंतरिक्ष में 350 से अधिक विभिन्न अणुओं की पहचान की है। पहला ऐसा अणु 1937 में खोजा गया था। हर वर्ष अंतरिक्ष के “रासायनिक भंडार” में कुछ नए अणु जुड़ते हैं, जिनमें से कई ऐसे होते हैं जो जीवन से जुड़े जैव-अणुओं के पूर्ववर्ती हो सकते हैं। यही कारण है कि ये खोजें जीवन की उत्पत्ति को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

अंतरिक्ष रसायन विज्ञान (एस्ट्रोकेमिस्ट्री) के विशेषज्ञ बताते हैं कि वे विशेष रूप से उन क्षेत्रों का अध्ययन करते हैं जहां नए तारे बनते हैं और जहां रासायनिक प्रक्रियाएं अत्यंत जटिल होती हैं। हालांकि, दूरस्थ अंतरिक्ष में मौजूद अणुओं का प्रत्यक्ष अध्ययन संभव नहीं है, इसलिए वैज्ञानिक दूरबीनों पर निर्भर रहते हैं।

ये दूरबीनें विद्युत चुंबकीय विकिरण के विभिन्न रूपों, विशेषकर रेडियो तरंगों, को पकड़ती हैं। रेडियो दूरबीनें ऐसे संकेत दर्ज करती हैं जो तब उत्पन्न होते हैं जब अंतरिक्ष में मौजूद अणु घूमते हुए ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं। यह ऊर्जा फोटॉन के रूप में दूरबीनों तक पहुंचती है, और इसी आधार पर वैज्ञानिक अणुओं की पहचान करते हैं।

यदि किसी अणु के सभी अपेक्षित संकेत (स्पेक्ट्रम) मिल जाते हैं, तो वैज्ञानिक उसकी उपस्थिति की पुष्टि कर सकते हैं। लेकिन कई बार संकेत कमजोर होते हैं या कई अणुओं के संकेत आपस में मिलकर भ्रम पैदा करते हैं, जिससे पहचान कठिन हो जाती है।

किसी नए अणु की पहचान करने से पहले वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला में उसका “फिंगरप्रिंट” तैयार करना होता है। इसके लिए कंप्यूटर मॉडल और प्रयोगात्मक तकनीकों का उपयोग किया जाता है ताकि यह समझा जा सके कि वह अणु अंतरिक्ष में किस प्रकार का संकेत देगा। इसके बाद दूरबीनों के डेटा से तुलना कर निष्कर्ष निकाला जाता है।

हालांकि, यह प्रक्रिया हमेशा सरल नहीं होती। कई बार प्रारंभिक दावे बाद में गलत साबित होते हैं। इसका कारण यह है कि कुछ संकेत बहुत कमजोर होते हैं या वे अन्य अणुओं के संकेतों के साथ मिल जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, दो दशक पहले अंतरिक्ष में जीवन से जुड़े एक महत्वपूर्ण अणु ग्लाइसिन की उपस्थिति का दावा किया गया था। ग्लाइसिन सबसे सरल अमीनो अम्ल है और पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक माना जाता है। लेकिन बाद के अध्ययनों में यह निष्कर्ष विवादित पाया गया और अधिकतर वैज्ञानिकों ने माना कि उस समय इसके पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले थे।

इसी तरह हाल के वर्षों में शुक्र ग्रह के वायुमंडल में फॉस्फीन की संभावित उपस्थिति को लेकर चर्चा हुई। फॉस्फीन कुछ जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ा हो सकता है, इसलिए इसके मिलने को संभावित जीवन संकेत के रूप में देखा गया, लेकिन बाद के शोध इसकी पुष्टि नहीं कर सके और वैज्ञानिकों के बीच इस पर अब भी सहमति नहीं है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे मामलों में जल्दबाजी से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है, क्योंकि प्रारंभिक उत्साह अक्सर गलत निष्कर्षों की ओर ले जा सकता है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि किसी भी नए अणु या संभावित जैव-चिह्न (बायोसिग्नेचर) की पुष्टि के लिए स्वतंत्र शोध समूहों द्वारा पुनः परीक्षण आवश्यक होता है। आमतौर पर जिन निष्कर्षों में केवल एक या दो संकेत मिलते हैं, वे कम विश्वसनीय माने जाते हैं, जबकि पाँच या उससे अधिक स्वतंत्र संकेत मिलने पर खोज अधिक ठोस मानी जाती है।

अंततः, वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि अंतरिक्ष में जीवन के संकेतों की खोज एक रोमांचक क्षेत्र जरूर है, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए धैर्य, सावधानी और व्यापक वैज्ञानिक सत्यापन अनिवार्य है।

(द कन्वरसेशन) मनीषा अविनाश

अविनाश


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