भ्रामक सूचनाओं के जाल से बचने के लिए सक्रिय रूप से पढ़ने की आदत जरूरी
भ्रामक सूचनाओं के जाल से बचने के लिए सक्रिय रूप से पढ़ने की आदत जरूरी
(जोआना पोजुलो, कार्लटन विश्वविद्यालय)
ओटावा, 27 जून (द कन्वरसेशन) यदि आप ‘जेनरेशन-जेड’ (जेन जेड) का हिस्सा हैं तो इस बात की काफी अधिक संभावना है कि समाचार और समसामयिक घटनाओं की जानकारी के लिए आप सोशल मीडिया पर निर्भर रहते हों।
‘प्यू रिसर्च सेंटर’ के आंकड़ों के अनुसार, यदि आपकी उम्र 30 वर्ष से कम है तो अन्य आयु वर्गों की तुलना में सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सूचनाओं पर आपका भरोसा अधिक होने की संभावना है।
हालांकि, सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री की विश्वसनीयता काफी भिन्न होती है। स्वास्थ्य, राजनीति और विवादास्पद समाचार जैसे क्षेत्रों में भ्रामक या गलत सूचनाओं की दर 30 से 50 प्रतिशत या उससे भी अधिक हो सकती है।
वर्ष 2024 में 45 देशों के 500 सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 62 प्रतिशत लोग कोई भी जानकारी साझा करने से पहले गंभीर रूप से उसकी तथ्य-जांच नहीं करते। ऐसे में आज के डिजिटल सूचना परिवेश में सही-गलत की पहचान करने के लिए मजबूत आलोचनात्मक सोच की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
इस प्रक्रिया में पढ़ने की आदत बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पढ़ना केवल जानकारी प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह विश्वसनीय तथ्यों और भ्रामक दावों के बीच अंतर करने की क्षमता भी विकसित करता है। लेकिन, केवल एक विशेष प्रकार की पठन-शैली ही इस क्षमता का निर्माण करती है। यह अंतर ‘पैसिव रीडिंग’ (निष्क्रिय होकर पढ़ना) और ‘एक्टिव रीडिंग’ (सक्रिय होकर पढ़ना) के बीच का है।
ऑटोपायलट मोड में पढ़ना-
संभव है कि आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक समय निष्क्रिय रूप से पढ़ने में बिताते हों। शोध बताते हैं कि लोग पढ़ते समय 80 प्रतिशत से अधिक सामग्री को केवल सरसरी निगाह से देखते या स्कैन करते हैं, न कि हर शब्द को ध्यान से पढ़ते हैं।
सोशल मीडिया लगातार छोटे-छोटे, भावनात्मक रूप से उत्तेजक और तेजी से बदलती हुई सामग्री प्रस्तुत करता है। इससे उपयोगकर्ता गहराई से पढ़ने के बजाय केवल स्क्रॉल करने और सतही तौर पर जानकारी लेने के आदी हो जाते हैं। त्वरित संतुष्टि देने वाला यह तरीका धीरे-धीरे उनकी स्वाभाविक आदत बन जाता है।
क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपने कुछ पढ़ तो लिया, लेकिन उस पर न विचार किया, न सवाल उठाए और न ही उसकी विश्वसनीयता पर गौर किया? यदि ऐसा अक्सर होता है तो संभव है कि आप निष्क्रिय पाठक हों।
‘पैसिव रीडिंग’ (निष्क्रिय होकर पढ़ना) के कुछ सामान्य संकेत हैं : पढ़ते-पढ़ते ध्यान भटक जाना, अभी-अभी पढ़ी गई बात को याद न रख पाना या समझा न पाना, पढ़ते समय साथ-साथ कोई दूसरा मानसिक कार्य करना, केवल औपचारिकता निभाने के लिए सामग्री को सरसरी निगाह से पढ़ना तथा महत्वपूर्ण अंशों को बिना समझे केवल रेखांकित कर देना।
शोध बताते हैं कि निष्क्रिय होकर पढ़ने की आदत व्यक्ति को बिना सवाल किए जानकारी स्वीकार करने की ओर ले जाती है। समय के साथ यह आदत उसे भ्रामक सूचनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है, क्योंकि वह विश्वसनीय और अविश्वसनीय जानकारी में अंतर करने की मानसिक क्षमता का पर्याप्त अभ्यास नहीं कर पाता।
उद्देश्यपूर्ण ढंग से पढ़ना—
‘एक्टिव रीडिंग’ (सक्रिय होकर पढ़ना) का अर्थ है किसी पाठ के साथ गहराई से जुड़ना। इसमें व्यक्ति अपनी धारणाओं को चुनौती देता है, प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच करता है और तर्कों को अपनी समझ की कसौटी पर परखता है। इस तरह पढ़ना केवल जानकारी प्राप्त करने का माध्यम नहीं रहता, बल्कि आलोचनात्मक सोच विकसित करने का प्रभावी साधन बन जाता है।
सक्रिय होकर पढ़ने के दौरान तर्कों, प्रमाणों और विभिन्न दृष्टिकोणों का मूल्यांकन किया जाता है। इससे किसी सूचना की विश्वसनीयता को परखने की क्षमता मजबूत होती है। प्रश्न पूछना, नोट्स बनाना और विभिन्न विचारों के बीच संबंध स्थापित करना समझ तथा विश्लेषण क्षमता-दोनों को बेहतर बनाता है।
समय के साथ सक्रिय रूप से पढ़ने की आदत व्यक्ति को कमजोर तर्कों और बिना प्रमाण वाले दावों की पहचान करना सिखाता है। वह लेखक और स्वयं अपने पूर्वाग्रहों को भी समझने लगता है, तथ्य और राय में अंतर कर पाता है तथा किसी निष्कर्ष को स्वीकार करने से पहले उसके आधार का मूल्यांकन करता है।
यदि पढ़ने का तरीका निष्क्रिय से सक्रिय बनाया जाए तो विचारों का विश्लेषण करने, सवाल करने और उनका मूल्यांकन करने की क्षमता विकसित होती है, जो भ्रामक सूचनाओं की पहचान करने में बेहद उपयोगी साबित होती है।
सक्रिय रूप से पढ़ने की आदत कैसे अपनाएं—
अगली बार जब आप कुछ पढ़ने बैठें तो कुछ सरल लेकिन प्रभावी आदतें अपनाने का प्रयास करें। महत्वपूर्ण शब्दों और तर्कों को चिन्हित करें, नोट्स बनाएं और स्वयं से पूछें कि किसी दावे के समर्थन में क्या प्रमाण दिए गए हैं। यह भी परखें कि प्रस्तुत बात तथ्य है या केवल राय।
लेखक के उद्देश्य और संभावित पूर्वाग्रहों पर भी विचार करें। लेखक के निष्कर्ष को तुरंत स्वीकार करने के बजाय पहले स्वयं अपनी राय बनाएं और पढ़ने के बाद मुख्य विचारों पर दोबारा सोचें कि उनके क्या व्यापक निहितार्थ हो सकते हैं।
ये आदतें पढ़ने को केवल सूचना ग्रहण करने की प्रक्रिया नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे बौद्धिक प्रशिक्षण में बदल देती हैं। उद्देश्य केवल अधिक पढ़ना नहीं, बल्कि बेहतर तर्क क्षमता, व्यापक दृष्टिकोण और दुनिया को अधिक गहराई से समझने की योग्यता विकसित करना होना चाहिए।
विशेष रूप से तथ्य-आधारित गैर-काल्पनिक (नॉन-फिक्शन) पुस्तकें आलोचनात्मक सोच विकसित करने में अत्यंत उपयोगी होती हैं। ऐसी पुस्तकें जटिल तर्कों का अनुसरण करने और प्रस्तुत साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करती हैं। वे दावों के पीछे छिपी मान्यताओं को समझने, तार्किक विसंगतियों को पहचानने और यह परखने की आदत विकसित करती हैं कि निष्कर्ष तथ्यों पर आधारित हैं या केवल व्यक्तिगत मत पर।
साथ ही, अलग-अलग वैचारिक, सांस्कृतिक और पेशेवर पृष्ठभूमि वाले लेखकों को पढ़ना भी लाभकारी है। एक ही विषय पर विविध दृष्टिकोणों से परिचित होने पर सोच का दायरा बढ़ता है और केवल अपनी मान्यताओं की पुष्टि करने वाली जानकारी खोजने की प्रवृत्ति कम होती है।
जितना विविध आपका अध्ययन होगा, उतनी ही अधिक चिंतनशील और आलोचनात्मक आपकी सोच बनेगी।
द कन्वरसेशन रवि कांत गोला
गोला

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