तारा कहलाने की कसौटी आखिर क्या है? ‘बीच की स्थिति वाली’ खगोलीय वस्तु ने खगोलविदों के समक्ष खड़ी की नयी चुनौती

तारा कहलाने की कसौटी आखिर क्या है? ‘बीच की स्थिति वाली’ खगोलीय वस्तु ने खगोलविदों के समक्ष खड़ी की नयी चुनौती

तारा कहलाने की कसौटी आखिर क्या है? ‘बीच की स्थिति वाली’ खगोलीय वस्तु ने खगोलविदों के समक्ष खड़ी की नयी चुनौती
Modified Date: July 3, 2026 / 02:42 pm IST
Published Date: July 3, 2026 2:42 pm IST

(मोहम्मद रेडयान अहमद, सिडनी विश्वविद्यालय)

सिडनी, तीन जुलाई (द कन्वरसेशन) पृथ्वी से करीब 1,350 प्रकाश वर्ष दूर टीओआई-2155 नाम का एक तारा है। यह सूर्य से थोड़ा बड़ा, अधिक भारी और ज्यादा गर्म है लेकिन यह अपने आप में न तो विशेष रूप से रोचक है और न ही असामान्य।

लेकिन टीओआई-2155 की परिक्रमा कर रही एक वस्तु वास्तव में बेहद दिलचस्प है। इसे टीओआई-2155बी कहा जाता है और यह तारे से काफी छोटी है। इसके बारे में हमें तब पता चलता है जब यह छोटी चीज अपने मुख्य तारे के सामने से गुजरती है और तारे की रोशनी में बहुत मामूली बदलाव होते हैं।

टीओआई-2155बी आखिर क्या है? एक छोटा तारा, एक विशाल ग्रह या फिर दोनों के बीच की कोई वस्तु?

मैंने और मेरे सहयोगियों ने हाल में ‘द एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल’ में प्रकाशित एक शोधपत्र में लिखा है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टीओआई-2155बी को पूरी तरह तारा माना जा सकता है या नहीं। हालांकि, ऐसा लगता है कि यह आकाश में तेज रोशनी बिखेरने वाले तारे और ऐसे विफल तारे के बीच की दिलचस्प सीमा पर स्थित है, जिसमें हाइड्रोजन संलयन की प्रक्रिया कभी स्थायी रूप से शुरू नहीं हो पाती।

तारे विफल क्यों हो जाते हैं

तारे अंतरिक्ष में मौजूद गैस के विशाल पिंडों के रूप में बनना शुरू होते हैं लेकिन गैस का कोई पिंड कितना बड़ा और भारी होना चाहिए कि वह तारा बन सके? यह सवाल सरल लगता है लेकिन खगोलविद इसके जवाब पर दशकों से बहस करते रहे हैं।

किसी तारे के भीतर गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना अधिक होना चाहिए कि वह हाइड्रोजन परमाणुओं को आपस में मिलाकर हीलियम परमाणुओं में बदल सके और यह प्रक्रिया लंबे समय तक लगातार जारी रहे। इसी प्रक्रिया से वह तेज गर्मी और प्रकाश पैदा होता है जो किसी तारे की पहचान है।

अगर कोई वस्तु इतना दबाव पैदा करने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ी नहीं होती या किसी अन्य कारण से उसमें संलयन की प्रक्रिया ठीक तरह शुरू नहीं हो पाती तो गैस का वह पिंड एक तरह का ‘‘विफल तारा’’ बन जाता है, जिसे भूरा बौना (ब्राउन ड्वार्फ) तारा कहा जाता है। ये वस्तुएं अपने शुरुआती जीवन में गर्म होती हैं, लेकिन स्थायी हाइड्रोजन संलयन नहीं होने के कारण वे धीरे-धीरे ठंडी हो जाती हैं और हल्की इन्फ्रारेड चमक छोड़ती हैं।

खगोल भौतिकीविद यह समझने के लिए बीच की श्रेणी वाली वस्तुओं यानी सबसे भारी भूरे बौने तारों और सबसे हल्के तारों का अध्ययन करते हैं कि गैस के कुछ पिंड तारे क्यों बनते हैं और कुछ भूरे बौने तारे क्यों रह जाते हैं। टीओआई-2155बी इसी श्रेणी में आती है। इसका द्रव्यमान बृहस्पति से करीब 80.6 गुना अधिक है और यह सैद्धांतिक सीमा के ठीक आसपास स्थित है।

तारों की परिभाषा कहां समाप्त होती है और भूरे बौने तारों की परिभाषा कहां से शुरू होती है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ (नासा) के ‘ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट’ (टीईएसएस) और दुनिया भर में स्थित जमीन आधारित दूरबीनों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल कर हमने टीओआई-2155बी के आकार और द्रव्यमान का सटीक आकलन किया। इसका आकार लगभग बृहस्पति जितना ही है, लेकिन इसका द्रव्यमान उससे करीब 80 गुना अधिक है।

ऐसा माना जा सकता है कि कोई निश्चित द्रव्यमान होगा, जिस पर कोई वस्तु अचानक तारा बन जाती होगी लेकिन वास्तविकता में ऐसी कोई स्पष्ट सीमा नहीं है।

खगोलविद परंपरागत रूप से इस सीमा को बृहस्पति के द्रव्यमान से करीब 75 से 80 गुना अधिक मानते रहे हैं लेकिन आधुनिक सैद्धांतिक मॉडल बताते हैं कि यह बदलाव केवल द्रव्यमान पर ही नहीं, बल्कि अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।

किसी वस्तु की आयु, उसकी रासायनिक संरचना और यहां तक कि उसके वायुमंडल की खासियत भी यह तय करती हैं कि उसमें स्थायी हाइड्रोजन संलयन हो सकता है या नहीं। यही कारण है कि खगोलविदों में इस बात पर अब भी मतभेद है कि भूरे बौने तारों और तारों के बीच द्रव्यमान की सीमा कहां तय की जानी चाहिए।

बेहद दुर्लभ खगोलीय वस्तु

टीओआई-2155बी अब तक खोजे गए सबसे भारी भूरे बौने तारों में से एक या सबसे हल्के तारों में से एक हो सकता है।

द्रव्यमान के बदलाव वाली इस श्रेणी में बहुत कम ज्ञात वस्तुएं हैं और टीओआई-2155बी इस सीमा को बेहतर ढंग से समझने में हमारी मदद करेगा।

खगोल विज्ञान में अक्सर सबसे दुर्लभ वस्तुओं से ही सबसे अधिक जानकारी मिलती है।

हालांकि, केवल एक वस्तु से इस सीमा की सटीक स्थिति तय नहीं की जा सकती। द्रव्यमान के बदलाव वाली इस श्रेणी की और वस्तुओं की खोज करने तथा उनका सटीक अध्ययन किए जाने के बाद ही हम अपने मॉडलों में सुधार करके यह समझ पाएंगे कि किन परिस्थितियों में कोई तारा प्रज्वलित होता है और अरबों वर्षों तक चमकता रहता है। इसी प्रक्रिया ने ब्रह्मांड को वह स्वरूप दिया है, जैसा आज हम उसे जानते हैं।

द कन्वरसेशन सिम्मी रंजन

रंजन


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