NindakNiyre: मोबाइल डिवाइस के कोर ऑब्जेक्टिव के अलावा यूज को गवर्न करने के लिए क्यों न एक मंत्रालय अलग बनाया जाए
Mobile Calling New Rule
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
फोन हमे खा रहा है या हम फोन को खा रहे हैं, नतीजे में खत्म हम ही हो रहे हैं। मैन-की सर्वेज की मोबाइल डिवाइस यूजर्स रिपोर्ट में कॉलिंग यूज महज 9 फीसद रह गया है। यानि 91 परसेंट मोबाइल डिवाइस का इस्तेमाल कुछ और है। इस रिपोर्ट में वॉट्सएप का खासा दखल है। करीब 41 फीसद डिवाइस वॉट्सएप में काम आ रही है। अब सोचिए बाकी 50 परसेंट मोबाइल किस काम आ रहा है। हम अपना टाइम स्पेंट देखेंगे तो दिन में 4-5 घंटे फोन के साथ बिताना आम है।
बाकी बचे 50 फीसदी यूज में यूट्यूब, फेसबुक, सोशल साइट्स, उपयोगी साइट्स सर्फिंग से लेकर स्नैपचैट और बाकी सब शामिल हैं। यानी जो मोबाइल बनाया बात करने के लिए गया है, वह बात करने में सिर्फ 9 फीसद ही इस्तेमाल हो रहा है। अपने कोर ऑब्जेक्टिव में इतनी गिरावट चौकाने वाली है। रिपोर्ट थोड़ी और डिटेल जाती है जिसमें पता चलता है कॉलिंग में भी पिछले 3 सालों में रेगुलर कॉलिंग का रेशो तेजी से गिरा है। अल्टनेटिव कॉलिंग पाथ का इस्तेमाल 44 परसेंट की रफ्तार से बढ़ा है। जैसे कि स्नैपचैट, फेसबुक, वॉट्सएप कॉलिंग आदि।
मेरी चिंता डिवाइस का 9 फीसद कॉलिंग यूज नहीं है, मेरा कंसर्न 50 फीसद दूसरी चीजों के यूज पर है। 41 परसेंट वॉट्सप भी चिंताजनक है, लेकिन बचा हुआ 50 फीसद बहुत चौंकाने वाला है। मैन-की सर्वेज की इस रिपोर्ट डिटेलिंग में एक फैक्ट घबराहट पैदा करता है। इसमें 50 फीसद लिंक्डइन, फेसबुक, एक्स, यूट्यूब पर भी 80 परसेंट रील्स का कंजंप्शन है। हालांकि रिपोर्ट इससे आगे नहीं बताती, किंतु मैं मानता हूं यह रील्स को विलैन बनाने का वक्त नहीं है। बल्कि रील्स में देखे जा रहे कंटेंट को समझने का वक्त है। किसी भी डिवाइस का कोर ऑब्जेक्टिव घटता है घटे, लेकिन अल्टनेट जो होता है सही दिशा में हो जाए।
मैं नहीं मानता कि रील्स को रोका जा सकता है या रोकने की जरूरत है। बल्कि इसके स्थान पर रील्स मेकिंग में पॉजिटिव, दिशायुक्त कंटेंट का रेशो बढ़ाने की जरूरत है। अभी भी यह कंटेंट है तो पर्याप्त। और बेहतर भी हो रहा है, लेकिन इसका नॉलेज, दिशा, आवश्यकता के साथ ही रोचक होना पहली शर्त है। कई मामलों में पहली और आखिरी भी।
वक्त अब मोबाइल डिवाइस के कोर ऑब्जेक्टिव को केंद्र में रखकर टेलीकॉम नीति बनाने का नहीं रहा, बल्कि इसके व्यापक इस्तेमाल पर नीति निर्माण का वक्त है। अतिश्योक्ति लग सकता है, किंतु इसके प्रभाव और अभाव का सही अध्ययन करें तो आज एक अलग मंत्रालय तक बना दिया जाए तो कम ही होगा। एक रील मानव ज़ेहन पर जो असर छोड़ती है वह पूरे समाज का व्यवहार होता है। इसलिए इस मसले पर गंभीरता से सोचने, विचारने, समझने का वक्त आ चुका है।

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