वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुदक्षिणा

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुदक्षिणा
Modified Date: July 28, 2026 / 01:57 pm IST
Published Date: July 28, 2026 1:57 pm IST
HIGHLIGHTS
  • संघ में कोई व्यक्ति गुरु नहीं है; भगवा ध्वज गुरु है। यह व्यवस्था व्यक्ति-पूजा के स्थान पर आदर्श-पूजा की स्थापना करती है। ध्वज त्याग, तप, शुचिता, सेवा, राष्ट्रनिष्ठा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है। इसलिए स्वयंसेवक अपनी गुरुदक्षिणा किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उन चिरंतन आदर्शों के प्रति समर्पित करता है जिनका ध्वज प्रतिनिधित्व करता है।
  • भारतीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि योग्य गुरु और योग्य शिष्य एक-दूसरे की खोज करते हैं। गुरु ज्ञान देने के लिए पात्र की तलाश करता है और शिष्य सत्य की खोज में गुरु तक पहुँचता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुदक्षिणा

भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा केवल शिक्षा की व्यवस्था नहीं, बल्कि मनुष्य-निर्माण की प्रक्रिया है। गुरु केवल जानकारी नहीं देता, वह दृष्टि देता है; शिष्य केवल ज्ञान ग्रहण नहीं करता, बल्कि अपने जीवन को संस्कारित करता है। यही कारण है कि भारत में गुरु का स्थान माता-पिता के बाद नहीं, बल्कि अनेक प्रसंगों में उनसे भी उच्च माना गया है, क्योंकि गुरु मनुष्य के भीतर निहित श्रेष्ठता को जागृत करता है।

आज के समय में जब शिक्षा का केंद्र रोजगार, प्रतियोगिता और तकनीकी दक्षता बनता जा रहा है, तब गुरु-शिष्य परंपरा हमें स्मरण कराती है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य चरित्र, विवेक और उत्तरदायित्व का निर्माण है। आधुनिक “मेंटर–मेंटी” व्यवस्था, शोध निर्देशन, नेतृत्व प्रशिक्षण और संस्थागत मार्गदर्शन उसी परंपरा के परिवर्तित रूप हैं, किंतु भारतीय गुरु-शिष्य संबंध की विशिष्टता यह है कि इसमें केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास भी सम्मिलित होता है।

विश्व के लगभग सभी विकसित सभ्यताओं में गुरु-शिष्य परंपरा किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू; चीन में कन्फ्यूशियस; बौद्ध परंपरा में बुद्ध और आनंद; ईसाई परंपरा में यीशु और उनके प्रेरित; सूफी परंपरा में पीर और मुरीद—सभी इस बात के प्रमाण हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा के हस्तांतरण से बनी रहती है।

भारतीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि योग्य गुरु और योग्य शिष्य एक-दूसरे की खोज करते हैं। गुरु ज्ञान देने के लिए पात्र की तलाश करता है और शिष्य सत्य की खोज में गुरु तक पहुँचता है। यह संबंध लेन-देन का नहीं, बल्कि श्रद्धा, पात्रता और उत्तरदायित्व का संबंध है। इसी संदर्भ में गुरुदक्षिणा का वास्तविक अर्थ समझना आवश्यक है। गुरुदक्षिणा किसी ज्ञान का मूल्य नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता और अपने जीवन को उसके आदर्शों के अनुरूप ढालने का संकल्प है। भारतीय परंपरा में सर्वोच्च गुरुदक्षिणा धन नहीं, बल्कि आचरण, सेवा, चरित्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्व मानी गई है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसी सनातन परंपरा को एक विशिष्ट स्वरूप दिया है। संघ में कोई व्यक्ति गुरु नहीं है; भगवा ध्वज गुरु है। यह व्यवस्था व्यक्ति-पूजा के स्थान पर आदर्श-पूजा की स्थापना करती है। ध्वज त्याग, तप, शुचिता, सेवा, राष्ट्रनिष्ठा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है। इसलिए स्वयंसेवक अपनी गुरुदक्षिणा किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उन चिरंतन आदर्शों के प्रति समर्पित करता है जिनका ध्वज प्रतिनिधित्व करता है।
संघ में गुरुदक्षिणा केवल आर्थिक सहयोग का कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का अवसर है। यह स्वयं से प्रश्न करने का समय है—क्या मेरा चरित्र विकसित हुआ? क्या मेरी राष्ट्रभक्ति अधिक प्रखर हुई? क्या मेरा जीवन ध्येय के अधिक निकट पहुँचा? इस प्रकार गुरुदक्षिणा बाहरी अर्पण से अधिक आंतरिक समर्पण का पर्व बन जाती है।

वर्तमान समय का सबसे बड़ा संकट केवल सूचना का अभाव नहीं, बल्कि प्रेरणा, मार्गदर्शन और गुरुत्व का क्षय है। जिस समाज में आदर्श प्रेरक, मार्गदर्शक और चरित्रवान गुरु का प्रभाव कम होने लगता है, वहाँ नई पीढ़ी स्वच्छंदता को स्वतंत्रता और अनैतिकता को आधुनिकता समझने लगती है। परिणामस्वरूप जीवन से अनुशासन, कर्तव्यबोध और आत्मसंयम का क्षरण होने लगता है। स्वधर्म का बोध कमजोर पड़ता है, स्वदेशी का आत्मविश्वास क्षीण होता है और स्वराज का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित होकर रह जाता है, जबकि भारतीय चिंतन में स्वराज का अर्थ पहले आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण है। गुरु-शिष्य परंपरा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि विवेक, मर्यादा, उत्तरदायित्व और जीवन-दृष्टि का निर्माण करना है। इसलिए व्यास पूर्णिमा केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को संस्कारित, चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ बनाने का सांस्कृतिक संकल्प है। यही परंपरा व्यक्ति को उपभोक्ता नहीं, उत्तरदायी नागरिक; और भीड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्कृति का वाहक बनाती है।

आज के व्यक्तिवादी और त्वरित प्रसिद्धि के युग में गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व और बढ़ जाता है। यह हमें बताती है कि स्थायी नेतृत्व प्रचार से नहीं, संस्कार से बनता है; संगठन केवल व्यवस्था से नहीं, चरित्रवान कार्यकर्ताओं से बनता है; और राष्ट्र केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी जीवित सांस्कृतिक परंपराओं से सशक्त होता है। व्यास पूर्णिमा इसलिए केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का संकल्प है। यह हमें प्रेरित करती है कि हम ज्ञान के प्रति विनम्र रहें, गुरु-परंपरा के प्रति कृतज्ञ रहें, संस्कृति के प्रति ऋणी होने का बोध रखें और अपने जीवन को समाज तथा राष्ट्र के लिए समर्पित करने का संकल्प लें। यही भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का शाश्वत संदेश है।

–  कैलाश चन्द्र
मध्यक्षेत्र प्रचार प्रमुख (रा• स्व• संघ)

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