Paramhans Shriram babajee Talk: हो सकता है चींटी सोचती हो इंसान बेवकूफ हैं

Paramhans Shriram babajee Talk: हो सकता है चींटी सोचती हो इंसान बेवकूफ हैं
Modified Date: January 4, 2026 / 12:43 pm IST
Published Date: January 4, 2026 12:43 pm IST

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

 

अगर हम समझते हैं मनुष्य ही संसार को परिपूर्णता से समझता है शेष दूसरे प्राणी नहीं तो हम गलत भी हो सकते हैं। ईश्वर ने एक चीटीं को भी उतनी ही शिद्दत से बनाया है जितना कि हमे। किसी प्राणी को मिले प्राण भी वही प्राण हैं जो हमारे हैं। वायुमंडल की परिधि में आने वाले कीट-पतंगे तक प्राणवायु मंडल के दायरे में आते हैं। हो सकता है हम लाखों वर्षों से इस गलतफहमी में जी रहे हों कि इंसान ही श्रेष्ठ है, हमारा ही विज्ञान उन्नत है, बाकी प्राणी नहीं। और यह भी हो सकता है कि ऐसा ही कुछ कीट-पतंगे, जानवर हम इंसानों के बारे मे भी सोचते हों। वे भी आपस में बात करते हों और हंसते हों हम इंसानों पर। सोचते हों देखो इन इंसानों को कैसे बटोरने, जमाने, संग्रह करने, ईर्ष्या करने, अहंकार रखने में उलझे हुए हैं। किसी को पैसों का, किसी को संपत्ति का, किसी को संतान का, किसी को अपनी ही बुद्धि, भक्ति का अहंकार है। लेकिन यह मानने कोई तैयार नहीं है, कि दुनिया बनाने वाले ने सबको बनाया है, समग्रता से बनाया है, क्षमता से बनाया है और उपयोगिता से बनाया है।

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यह किसी पागल की कही बातें नजर आएंगी। परमहंस श्रीराम बाबाजी इन बातों को निरंतर जीया करते थे। उनकी प्राथमिकता में बंदर, मछली, गाय, कौए, श्वान रहते थे। वे पहाड़ियों पर बंदरों को काजू-कतली जैसी मिठाई भी खिला देते थे। जब बंदरों को खिलाते तो उन्हें दो बातें बड़ी अच्छी लगती थी। वे कहते थे आदमी उरझे हैं, इत्तो है इत्तो और चइए, मरो जा रौ, उन्हें देखो, जो कछु दौ खाओ और वे चिपके हैं पेढ़े में। नै सोबे, खाबे की चिंता नै कोई से छुड़ाबै की चिंता। (इंसान सोचता है इतना है इतना और हो जाए, तरस रहा है। बंदरों को देखो जो मिल जाए वह खाया और एक पेड़ में जाकर चिपक गए। न सोने, न खाने न किसी से कुछ छीनने की चिंता।) दूसरी बात वे बंदरों को मनुष्यों का जेनेरिक स्वरूप मानते थे। जैसा कि साइंटिस्ट डारबिन ने अपनी थ्यरी में कहा है। मछली के लिए तलाब, नदी में दाने डालना। कुत्ते जहां दिखें वहां भोजन देना। गाय को अपने समान खिलाना। कौओं के लिए तो खुला दरबार लग जाए। महाराजजी अक्सर पंचपंगत यानि कौओं, गौओं, श्वानों, मछलियों और बंदरों को खिलाते देखे जा सकते थे। वे कहते, आदमी से अच्छे तो जे लोग हैं, कम से कम झूटी तो नई बोलें। (आदमी से अच्छे तो ये सब जानवर हैं कम से कम झूठ तो नहीं बोलते, क्योंकि वे बोलते ही नहीं)

 

महाराजजी प्राणी मात्र में संपूर्ण ईश्वर मानते थे। हमारे शास्त्रीय और सनातन ग्रंथ भी यही संदेश देते हैं। कण-कण में राम, घट-घट में राम, सब राम के सबके राम। इस चिंतन का आशय सबमें सब कुछ मानना है।

 

ईश्वरीय जीवन चक्र में सबकी अहमियत है। कोई किसी से शरीर में छोटा-बड़ा हो सकता है। ताकत में कम या ज्यादा हो सकता है। चेतना के स्तर पर अलग-अलग हो सकता है। लेकिन आत्मा के स्तर पर सब एक हैं। सनातन परंपरा में भी सबको एक माना गया है। तभी जन्म लेता है चौरासी लाख योनियों का सिद्धांत। हम ऐसे कर्म कर चलें कि अगला जन्म भी इंसान का ही मिल जाए। इसके लिए परमहंस श्रीराम बाबाजी भजन की प्रेरणा देते थे। जब धुन में होते तो गाते थे सुमर पवनसुत पावन नामू, अपने बस करि राखे रामू।

 

एकबार बिलासपुर में विराजमान थे। किसी कारण वे दिनभर घर पर ही रहे। शाम को उक्ताहट के साथ बोले, आज कछु करई नई पाए। गौएं ही मिल जाएं तो उन्हें खुआ दें तो चैन मिले। (आज कुछ कर ही नहीं पाए, कहीं गायें ही मिल जाएं तो उन्हें खिला दें तो चैन मिल जाए।) उनकी इस बेचैनी को प्राणी मात्र में ईश्वर के दर्शन के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

(आगे पढ़िए सेवा की महिमा)

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Associate Executive Editor, IBC24 Digital