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Paramhans_Shrirambabajee: ब्राह्मणों का सम्मान, दान क्यों है जरूरी

बरुण सखाजी श्रीवास्तव भारतीय व्यवस्था की रीढ़ है सनातन व्यवस्था। सनातन व्यवस्था की रीढ़ है जाति व्यवस्था। सनातन को सर्वोपरि बनाए रखने में इस व्यवस्था ने अहम रोल अदा किया …

Barun Shrivastava
Published: 02 Jan 2026 | 7:33 pmModified: 09 Jul 2026 | 10:42 pm

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

भारतीय व्यवस्था की रीढ़ है सनातन व्यवस्था। सनातन व्यवस्था की रीढ़ है जाति व्यवस्था। सनातन को सर्वोपरि बनाए रखने में इस व्यवस्था ने अहम रोल अदा किया है। कालांतर में जातिय भेद और उपेक्षा ने हिंदुत्व को तोड़ा फिर सनातन पर आघात शुरू किया। यह मान लेना अलग बात है कि ब्राह्मण केंद्रित सनातन जाति व्यवस्था का होना जरूरी है, लेकिन इससे ज्यादा जान लेना होगा ब्राह्मण केंद्र से बाहर की व्यवस्था हिंदुत्व पर कितना बड़ा खतरा है। निर्णायक पंक्तियों से अपनी बात रखना घातक होता है, लेकिन आवश्यक भी होता है।

परमहंस श्रीराम बाबाजी जन्माजा ब्राह्मणों के पूजक और तारक रहे हैं। ब्राह्मण होने के अपने अहम में खोए विचिलतों को ठिकाने पर लाने और सुपथिक ब्राह्मणों को भरपूर दान, सम्मान दिलवाने की महाराजजी की क्रिया सतत चलती रहती। इसे ही हमे तारक और पूजक मानना चाहिए। पत्रकार होने के नाते मेरा समग्र चिंतन सामाजिक ताने-बाने के इर्दगिर्द ही रहा। जातियों की व्यवस्था में किसी के ज्यादा श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट होने का आधार किसी का जन्म सिर्फ नहीं हो सकता। इसके लिए योग्यता का एग्जाम देना ही होगा। इस बात को मजबूती से मानने के कारण जाति व्यवस्था का मैं पक्षधर नहीं रहा। ब्राह्मणों को दान, सम्मान की परंपरा देखकर मन में अनेक प्रश्न भी जन्म लेते रहते थे। इन प्रश्नों के उत्तर मिलने शुरू हुए जब महाराजजी के चरणों में प्रीति जागी।

कई बार हमे जो लगता है वह होता नहीं है। महाराजजी द्वारा की जाने वाली दान, सम्मान की क्रिया वास्तव में अच्छी ब्रीड के आम को पोषण देने की क्रिया के समान थी। मौका देते थे। सुपंथ पर आने का आह्वन करते थे। गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी मौखिक कम करके दिखाना, बताना ज्यादा करते थे। अनेक बार ऐसा होता था कि हम सवाल आज करें जवाब हो सकता है दो साल बाद मिले। हम अपने अहंकार भाव में अधिक होने के कारण रिकॉर्ड रख नहीं पाते। लेकिन जरा भी चीजों को सोचते हैं तो पता चलता है यह क्रिया कहां से कहां कैसे जुड़ी हुई है। ब्राह्मणों के अतिसम्मान की क्रिया को लेकर मेरे मन के अप्रकट प्रश्नों और जिज्ञासाओं का उत्तर महाराज जी ने देना शुरू कर दिया था। मैंने कभी पूछा नहीं लेकिन उन्होंने क्रियात्मक रूप से बताना शुरू किया।

संयोग से मनुष्य शरीर की संरचना, बनावट, जन्म की क्रिया, डीएनए आरएनए, जेनेटिक्स जैसे गूढ़ विषयों में मेरी रुचि स्वतः ही बढ़ती चली गई। इन विषयों में अभी पूर्ण नहीं घुस पाया, लेकिन मंथन, संवाद जारी है। इस बीच समझ आया महाराजजी ने एक यात्रा में कहा था जो है वह कभी था ही नहीं और जो था वह है ही नहीं। गुरुकृपा से इसकी व्याख्या मुझसे करवाई। मैंने उनके इस वाक्य को डिकोड करके बोला जैसे बिही पेड़ में लगने से पहले क्या थी। पेड़ का फल बनने से पहले फल क्या था। जन्म से पहले एक आत्मा क्या थी। यही वह है जो होता है लेकिन नहीं होता और यही वह है जो नहीं होता मगर होता है। यानि होने और नहीं होने के बीच का क्रम हमे समझ नहीं आता। जो हमे समझ नहीं आता वह है ही नहीं ऐसा कहना गलत है। यह सुनकर महाराज जी ने विराट आशीर्वाद देने जैसे भाव नेत्रों में प्रकट किए। मैं गाड़ी चलाते-चलाते भावुक हो गया। साक्षात हनुमानजी गाड़ी में बगल में बैठकर मुझ जैसे अधम को इतना सम्मान दे रहे हैं।

आगे समझ आया कुछ होने और न होने के बीच में ईश्वर है। वह आपके समग्र जन्म-जन्मों के कर्म का लेखा-जोखा है। इस लेखे-जोखे से ही हमे शरीर मिलता है। ज्यों एक ही आम की हजारों प्रजातियां होती हैं। जैसे फूलों की हजारों प्रजातियां होती हैं। जैसे सारी धरा मिट्टी से ढंकी है, लेकिन कुछ मिट्टी ज्यादा उत्पादक है कुछ बंजर। वैसे ही ब्राह्मण शरीर अन्य शरीर से ज्यादा गुणवत्ता की मशीन है। ज्यादा गुणवत्ता की मशीन होने का यह अर्थ नहीं है कि वह सिर्फ मशीन होने के नाते ही सर्वोच्च हो जाती है। इसका अर्थ है इस मशीन का चालक विवेकवान नहीं तो इससे कम गुणवत्ता की मशीन से भी यह मशीन मुकाबला नहीं कर पाएगी। गुणवत्ता वाली मशीनी संरचना का सम्मान असल में जन्माजा ब्राह्मण की पूजा है। इसके बाद की क्रिया सिद्ध करने की होती है।

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती कहते हैं मनुस्मृति आदि में जातियों का वर्गीकरण लिखा हुआ है। इसमें ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, लेकिन दूसरे अश्रेष्ठ नहीं हैं। ब्राह्मण को विशेषाधिकार नहीं विशेष जिम्मेदारी का वर्णन है। जैसे शराब का नशा करने की सबसे दर्दनाक सजा ब्राह्मण को देने का जिक्र है और सबसे कम सजा शूद्र को। इसका अर्थ क्या हुआ, ब्राह्मण एक जिम्मेदारी है। जैसे एक थानेदार कानून को हाथ में लेकर जनता का शोषण करे और आम आदमी ऐसा करे तो थानेदार होने के नात कोर्ट उस पर ज्यादा सख्ती दिखाएगा। तब थानेदार होना जिम्मेदारी हुई न कि विशेषाधिकार।
चैतन्य हनुमानजी श्रीराम बाबाजी इस क्रिया को ज्ञान, संज्ञान में न करके व्यवहार में करके दिखाते थे। व्याख्याएं अक्सर आम से आम आदमी तक नहीं पहुंच पाती। न समझ पाते। न सोच पाते। इसलिए करके दिखाओ, परंपरा बनाओ और व्यवस्था को मजबूत करो। एक घटनाक्रम और है जिसे फिर कभी साहस जुटाकर लिखूंगा।

(आगे पढ़िए नर्मदा परिक्रमा में जब महाराज जी के सामने प्रकट हो गईं नर्मदाजी)

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Barun Shrivastava
Barun Shrivastava

Associate Executive Editor, IBC24 Digital

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Web Title: Paramhans Shriram babajee talks about brahmin sacredness