अदाणी मामला दायर ही नहीं होना चाहिए था: अमेरिकी न्याय विभाग
अदाणी मामला दायर ही नहीं होना चाहिए था: अमेरिकी न्याय विभाग
न्यूयॉर्क, चार जुलाई (भाषा) अमेरिका के न्याय विभाग (डीओजे) ने भारतीय उद्योगपति गौतम अदाणी और सात अन्य के खिलाफ आपराधिक मामला बंद करने के अपने फैसले का संघीय अदालत में पुरजोर बचाव किया है।
विभाग ने एक संघीय न्यायाधीश से कहा कि यह मुकदमा कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण, राजनयिक रूप से प्रतिकूल और ट्रंप प्रशासन की प्रवर्तन प्राथमिकताओं के विपरीत था।
एक तीखे लहजे वाले 10 पन्नों के हलफनामे में न्याय विभाग ने कहा कि इस मामले को ‘एक साल पहले ही हटा दिया जाना चाहिए था या इसे कभी शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था।’
विभाग ने तर्क दिया कि आरोपों को पूरी तरह खारिज करने के फैसले की समीक्षा करने में अदालत की भूमिका बेहद सीमित है।
यह हलफनामा अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गराउफिस के उस आदेश के बाद आया है, जिसमें उन्होंने विभाग से यह बताने को कहा था कि वह इस आरोपपत्र को स्थायी रूप से क्यों खारिज करना चाहता है। न्यायाधीश ने विभाग के पिछले आवेदन को संक्षिप्त, नीरस और निष्कर्षहीन बताया था।
उल्लेखनीय है कि साल 2024 में बाइडन प्रशासन के तहत न्याय विभाग ने अदाणी और अन्य पर भारतीय सरकारी अधिकारियों को 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने की योजना में शामिल होने और निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाने के लिए झूठ बोलने का आरोप लगाया था। इस कथित योजना के दौरान अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड ने अमेरिकी निवेशकों से कम से कम 17.5 करोड़ डॉलर जुटाए थे।
न्याय विभाग ने कहा कि यदि अभियोजकों को मामले वापस लेने के फैसलों को सार्वजनिक रूप से सही ठहराने के लिए मजबूर किया जाएगा, तो इससे भविष्य में मामलों को खारिज करने की प्रक्रिया हतोत्साहित होगी। साथ ही इससे विभाग के आंतरिक विचार-विमर्श उजागर होंगे और आरोप तय करने के फैसलों पर कार्यपालिका के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉटटर ने लिखा, ‘‘मामले को वापस लेने के आधारों पर न्यायिक पूछताछ से विभाग के भीतर होने वाली गोपनीय आंतरिक चर्चाएं उजागर हो जाएंगी।”
उन्होंने कहा कि ऐसी मांग से प्रतिवादियों को भी नुकसान पहुंचता है, क्योंकि इससे विभाग उन आपराधिक आरोपों को खारिज करने के लिए कदम उठाने से हिचकिचा सकता है जिन्हें वह न्याय के हित में नहीं मानता।
मैककॉटर ने कहा कि केवल इसी मामले में गोपनीयता विशेषाधिकार को छोड़ते हुए उन्होंने अभियोग वापस लेने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि यह फैसला बचाव पक्ष के वकीलों के साथ महीनों तक चली बैठकों, सैकड़ों पन्नों के दस्तावेजों की समीक्षा और अपने स्वयं के कानूनी विश्लेषण के बाद लिया गया।
उन्होंने लिखा, ‘मामला खारिज करने का निर्णय कोई मुश्किल फैसला नहीं था।’
डीओजे ने मामले को वापस लेने के छह प्रमुख आधार बताए, जिनमें कहा गया कि कथित गतिविधि मुख्य रूप से भारत में हुई, भारतीय अधिकारियों ने जांच में कोई दंडनीय अपराध नहीं पाया, निवेशकों को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ, साक्ष्य और गवाह विदेश में हैं और आरोपियों के अमेरिका में पेश होने की संभावना बहुत कम है।
मैककॉटर ने अदालत में कहा, “यह एक विदेशी मामला है।”
उन्होंने कहा कि मामला ऐसे भारतीय नागरिकों से जुड़ा है जो भारत में ही भारत सरकार के अनुबंध पाने के लिए कार्य कर रहे थे।
उन्होंने यह भी कहा, “अमेरिका का खुद को दुनिया का पुलिसकर्मी मानना कूटनीतिक तनाव पैदा कर सकता है और संसाधनों की बर्बादी है, जिन्हें घरेलू प्राथमिकताओं पर लगाया जाना चाहिए।”
अमेरिका के न्याय विभाग ने यह भी कहा कि प्रतिभूति धोखाधड़ी के आरोप कानूनी रूप से कमजोर हैं क्योंकि कथित गतिविधियां लगभग पूरी तरह अमेरिका के बाहर हुईं और लेनदेन अमेरिकी अधिकार क्षेत्र की शर्तों को पूरा नहीं करते।
विभाग ने कहा कि निवेशकों को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ क्योंकि संबंधित प्रतिभूतियां या तो पूरी तरह चुका दी गईं या उनका भुगतान जारी है। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपपत्र में जिन बयानों का उल्लेख है, वे केवल कॉरपोरेट स्तर के सामान्य दावे हैं, जिन पर अनुभवी निवेशक भरोसा नहीं करते।
डीओजे ने कहा, “प्रतिभूति धोखाधड़ी के आरोप कभी दायर ही नहीं किए जाने चाहिए थे।”
विभाग ने यह भी कहा कि अधिकतम यह मामला दीवानी विवाद के रूप में देखा जा सकता था, आपराधिक नहीं।
विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (एफसीपीए) से जुड़े आरोपों पर विभाग ने कहा कि ये अब उसकी प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं हैं, जैसा कि जून 2025 के एक ज्ञापन में स्पष्ट किया गया था।
अंत में विभाग ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले को शीघ्र समाप्त किया जाए, क्योंकि लगातार न्यायिक समीक्षा से केवल अनिश्चितता बनी रहती है, जबकि सरकार स्वयं अब इस अभियोजन को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
भाषा योगेश रमण
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