स्वच्छ ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता 2035-36 तक 786 गीगावाट होने का अनुमान: रिपोर्ट
स्वच्छ ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता 2035-36 तक 786 गीगावाट होने का अनुमान: रिपोर्ट
नयी दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) देश ने 2035-36 तक कुल प्रस्तावित 1,121 गीगावाट क्षमता में से करीब 70 प्रतिशत यानी 786 गीगावाट स्वच्छ ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। वित्त वर्ष 2026-27 से शुरू होने वाले नवीनतम ‘राष्ट्रीय उत्पादन पर्याप्तता योजना’में यह जानकारी दी गई।
‘भारत इलेक्ट्रिसिटी’ शिखर सम्मेलन 2026 में जारी इस दस्तावेज के अनुसार, 2035-36 तक स्वच्छ ईंधन आधारित स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 786 गीगावाट यानी कुल स्थापित क्षमता का 70 प्रतिशत होगी।
देश में 28 फरवरी 2026 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से स्थापित उत्पादन क्षमता 275 गीगावाट थी, जो कुल 524 गीगावाट स्थापित क्षमता का लगभग 52.5 प्रतिशत है।
उत्पादन योजना अध्ययनों के अनुसार, 2035-36 के अंत तक कुल स्थापित क्षमता 1,121 गीगावाट होने का अनुमान है जिसमें 315 गीगावाट कोयला, 20 गीगावाट गैस, 22 गीगावाट परमाणु, 78 गीगावाट बड़े जलविद्युत, 509 गीगावाट सौर, 155 गीगावाट पवन, 16 गीगावाट बायोमास और 6 गीगावाट लघु जलविद्युत शामिल हैं।
इसके अलावा, 2035-36 तक 174 गीगावाट/888 गीगावाट-घंटा ऊर्जा भंडारण क्षमता (जिसमें 80 गीगावाट/321 गीगावाट-घंटा बैटरी भंडारण प्रणाली और 94 गीगावाट/567 गीगावाट-घंटा पंप भंडारण परियोजनाएं शामिल हैं) स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
जीवाश्म ईंधन (कोयला आदि) आधारित स्थापित उत्पादन क्षमता 2035-36 तक घटकर लगभग 30 प्रतिशत रह जाएगी।
कोयला आधारित तापीय क्षमता हालांकि बनी रहेगी और आधार भार के रूप में काम करेगी।
इसी प्रकार, जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता जनवरी 2026 के 48 प्रतिशत की तुलना में 2035-36 तक करीब 30 प्रतिशत रह जाएगी।
यह बदलाव जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों से सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु एवं भू-तापीय जैसे गैर-जीवाश्म विकल्पों की ओर बदलाव को दर्शाता है जिसके साथ ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का भी समावेश होगा।
कई देश महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य तय कर रहे हैं, जिनमें कई देश मध्य शताब्दी या उसके बाद शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रख रहे हैं। अमेरिका ने 2050 तक, चीन ने 2060 तक और भारत ने 2070 तक इसे हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक की अवधि में अनुमानित बिजली मांग को विश्वसनीय रूप से पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता विस्तार का न्यूनतम लागत वाला विकल्प तय करने हेतु दीर्घकालिक राष्ट्रीय उत्पादन पर्याप्तता अध्ययन किया गया है।
इसका उद्देश्य कुल प्रणाली लागत को न्यूनतम करना है, जिसमें भविष्य के निवेश की लागत और पूरी उत्पादन प्रणाली के संचालन की लागत शामिल है। साथ ही विभिन्न बिजली उत्पादन प्रौद्योगिकियों से जुड़े सभी तकनीकी मानकों को पूरा करना भी सुनिश्चित करना है।
वित्त वर्ष 2035-36 में अनुमानित अधिकतम बिजली मांग 459 गीगावाट और विद्युत ऊर्जा आवश्यकता 3,365 अरब यूनिट रहने का अनुमान है।
इस रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में 2035-36 तक 900 गीगावाट से अधिक गैर-जीवाश्म क्षमता से बिजली निकासी के लिए पारेषण प्रणाली की योजना बनाई गई है, जो आवश्यक क्षमता से अधिक है ताकि प्रसारण प्रणाली के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखा जा सके।
वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 के दौरान अतिरिक्त पवन और सौर क्षमता के एकीकरण के लिए अंतर-राज्यीय तथा राज्य स्तरीय पारेषण प्रणालियों के तहत 1,37,500 सर्किट किलोमीटर लाइन और 8,27,600 एमवीए उपकेंद्र क्षमता की योजना बनाई गई है जिसकी अनुमानित लागत 7,93,300 करोड़ रुपये है।
इसके अलावा, बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अध्ययन में 2047 तक परमाणु ऊर्जा आधारित उत्पादन क्षमता को 100 गीगावाट तक बढ़ने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।
भाषा निहारिका रमण
रमण

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