सार्वजनिक नीति में ‘मुफ्त’ सबसे महंगा शब्द: सीईए नागेश्वरन

सार्वजनिक नीति में 'मुफ्त' सबसे महंगा शब्द: सीईए नागेश्वरन

सार्वजनिक नीति में ‘मुफ्त’ सबसे महंगा शब्द: सीईए नागेश्वरन
Modified Date: August 3, 2026 / 03:07 pm IST
Published Date: August 3, 2026 3:07 pm IST

चेन्नई, तीन अगस्त (भाषा) मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी अनंत नागेश्वरन ने सोमवार को कहा कि ‘सार्वजनिक नीति में मुफ्त’ सबसे महंगा शब्द है।

उन्होंने चेतावनी दी कि लागत से कम कीमत पर सेवाओं के वादे के आधार पर बुनियादी ढांचे का निर्माण करना एक ऐसा विरोधाभास है, जो आखिर में आर्थिक संतुलन को बिगाड़ देता है।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के तमिलनाडु अवसंरचना सम्मेलन 2026 को संबोधित करते हुए नागेश्वरन ने कहा कि उपयोगिता दरों, शहरी विकास और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण से जुड़ी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था भारी नुकसान पहुंचा रही है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने रेखांकित किया कि पानी जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं की शून्य दर तय करने से समाज उन्हें असीमित मानने लगता है, जिसके चलते आखिर में बर्बादी और विनाश ही होता है।

उन्होंने कहा, ‘‘जिस चीज को हम मुफ्त कहते हैं, उसी को हम नष्ट करते हैं। यह कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह एक नीतिगत विकल्प है और इसे अलग तरीके से भी चुना जा सकता है।’’

उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज किया कि इस तरह से कम कीमतें तय करना एक सामाजिक सुरक्षा के रूप में काम करता है। इसके विपरीत, नागेश्वरन ने तर्क दिया कि मुफ्त पानी प्रभावी रूप से उन संपन्न परिवारों को सब्सिडी देता है जिनके पास पहले से ही पाइप से पानी का कनेक्शन है। वहीं दूसरी ओर वास्तव में वंचित वर्ग, जिनके पास अक्सर ऐसे कनेक्शन नहीं होते, वे निजी टैंकर से मानक दर से कई गुना अधिक कीमत पर पानी खरीदने के लिए मजबूर हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि ईमानदार और उचित दर तय करने से सरकार सीधे तौर पर वंचितों की रक्षा कर सकेगी, जबकि उपयोगिता सेवाएं देने वाली संस्थाएं इतनी कमाई कर सकेंगी कि वे उन लोगों तक भी नेटवर्क का विस्तार कर सकेंगी, जिनके पास अभी तक कनेक्शन नहीं हैं।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, ‘‘किसी न किसी को तो अंत में भुगतान करना ही पड़ेगा।’’ उन्होंने बताया कि इसके केवल तीन ही वास्तविक परिणाम होते हैं- या तो उपभोक्ता उचित शुल्क दे, या करदाता इस बोझ को उठाए, अथवा रखरखाव की कमी से सार्वजनिक संपत्ति धीरे-धीरे जर्जर होकर खुद इसकी कीमत चुकाये।

भाषा पाण्डेय अजय

अजय


लेखक के बारे में