ब्रिक से ब्रिक्स तक: चार देशों से 11 सदस्यीय समूह बनने का दो दशक लंबा सफर

ब्रिक से ब्रिक्स तक: चार देशों से 11 सदस्यीय समूह बनने का दो दशक लंबा सफर

ब्रिक से ब्रिक्स तक: चार देशों से 11 सदस्यीय समूह बनने का दो दशक लंबा सफर
Modified Date: September 10, 2026 / 04:50 pm IST
Published Date: September 10, 2026 4:50 pm IST

नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) करीब एक-चौथाई सदी पहले वैश्विक निवेश कंपनी गोल्डमैन सैक्स के एक अर्थशास्त्री ने तेजी से बढ़ती चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चार अक्षरों का एक संक्षिप्त नाम गढ़ा था। उन्होंने ‘ब्रिक’ (ईंट) शब्द से तुकबंदी करते हुए अपनी शोध रिपोर्ट का नाम ‘बिल्डिंग बेटर ग्लोबल इकोनॉमिक ब्रिक्स’ रखा था जो आगे चलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन देशों की मजबूती और दीर्घकालिक संभावनाओं का प्रतीक बन गया।

यह संक्षिप्त नाम धीरे-धीरे दुनियाभर में लोकप्रिय हुआ और ‘ब्रिक’ निवेश जगत की शब्दावली का हिस्सा बन गया। इसका इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन के उस समूह के लिए किया गया, जिन्हें वैश्विक आर्थिक वृद्धि के लिए भविष्य का प्रमुख वाहक माना जा रहा था।

समय के साथ इस समूह का विस्तार हुआ। दक्षिण अफ्रीका के 2010 में शामिल होने के बाद इस समूह का नाम ‘ब्रिक्स’ हो गया। आज के समय इस समूह में 11 सदस्य देश हैं। हालांकि, नेताओं ने इस बहुराष्ट्रीय समूह के लिए पांच अक्षरों वाले नाम ‘ब्रिक्स’ को ही बरकरार रखने का फैसला किया।

दिलचस्प बात यह है कि 2006 में इस समूह की पहली सरकार-स्तरीय बैठक में ईरान और पश्चिम एशिया की स्थिति पर काफी चर्चा हुई थी। इसके करीब दो दशक बाद जब इस सप्ताहांत नयी दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के लिए नेता जुटेंगे, तब ईरान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में होगा। इस बार ईरान खुद भी समूह का सदस्य है और उसके राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं।

मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) 2024 में ब्रिक्स के पूर्ण सदस्य बने थे, जबकि इंडोनेशिया जनवरी 2025 में समूह का हिस्सा बना।

इसके अलावा बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम पिछले साल ब्रिक्स के साझेदार देश बने।

बहुराष्ट्रीय समूह के रूप में ब्रिक को औपचारिक रूप से 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक में स्थापित किया गया था।

ब्रिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों का पहला शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में हुआ था। इसमें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रूस के दिमित्री मेदवेदेव, चीन के हू जिंताओ और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने हिस्सा लिया था।

पहली शिखबर बैठक में शामिल नेताओं में से लूला ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो अब भी अपने देश के राष्ट्रपति पद पर हैं। हालांकि, उनके 12-13 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना नहीं है और उनके विदेश मंत्री के प्रतिनिधित्व करने की उम्मीद है।

वर्ष 2009 में इन शिखर सम्मेलनों की शुरुआत से पहले के दशक में दुनिया की नजर इस बात पर थी कि किस तरह पहली बार उभरती अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि विकसित देशों की तुलना में तेज हो रही थी।

इसी रुझान ने उस समय गोल्डमैन सैक्स में वैश्विक आर्थिक शोध के प्रमुख जिम ओ’नील को चार तेजी से बढ़ती उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर केंद्रित शोध-पत्र तैयार करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इन्हें भविष्य में वैश्विक आर्थिक वृद्धि के प्रमुख वाहकों के रूप में रेखांकित किया था।

उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विश्व अर्थव्यवस्था में ‘ब्रिक देशों का महत्व’ अगले 10 वर्षों में काफी बढ़ेगा। उन्होंने जी7 समूह में बदलाव कर उसमें ब्रिक देशों को प्रतिनिधित्व देने की भी वकालत की थी।

इसके बाद आने वाले वर्षों में इस विषय पर कई अन्य शोध रिपोर्ट प्रकाशित हुईं। इनमें 2003 में गोल्डमैन सैक्स की ‘ड्रीमिंग विद ब्रिक्स : द पाथ टू 2050’ शीर्षक रिपोर्ट भी शामिल है। इसमें अनुमान लगाया गया था कि ब्रिक देश 2039 तक संभवतः पश्चिम की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से आगे निकल सकते हैं।

इसके बाद दुनियाभर के बाजारों में ब्रिक्स पर केंद्रित कई म्यूचुअल फंड, एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) और सूचकांक शुरू किए गए।

समूह ने 2014 में ब्रिक्स विकास बैंक बनाने की घोषणा भी की, जिसे बाद में नव विकास बैंक (एनडीबी) नाम दिया गया।

भारत की अध्यक्षता में हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आधिकारिक विषय ‘मजबूती, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण’ है।

भाषा प्रेम प्रेम रमण

रमण


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