नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) खेती-किसानी का काम करने वाली भारत की आधी महिलाओं को आधिकारिक तौर पर कृषक नहीं माना जाता है। पहचान की इस कमी के कारण देश को हर साल खेती के उत्पादन में 1.2 से दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। एग्री-कॉमर्स मंच आर्या.एजी की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
‘हर हार्वेस्ट 2026: भारतीय कृषि में महिलाओं के अदृश्य कार्यो की छुपी लागत’ शीर्षक की इस रिपोर्ट में पाया गया कि खेती में काम करने वाली 50.5 प्रतिशत महिलाओं को पारिवारिक खेतों में बिना वेतन के मदद करने वाले के रूप में दर्ज किया जाता है, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 21.7 प्रतिशत है।
सरकारी आंकड़ों में, ‘मददगार’ को ‘खेती करने वाला’ नहीं माना जाता है। जिस महिला को खेती करने वाला नहीं माना जाता, उसे ऋण, विस्तार सेवाएं, खरीद प्रणालियां, लागत सब्सिडी या उन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता जो जमीन के मालिकाना हक के रिकॉर्ड के आधार पर दिए जाते हैं।
एफएओ के इस अनुमान को भारत के 48.7 लाख करोड़ रुपये के कृषि सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) पर लागू करने से सालाना नुकसान का आंकड़ा 1.2 से दो लाख करोड़ रुपये बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा इसलिए नहीं है कि महिलाएं कम कुशलता से खेती करती हैं, बल्कि इसलिए है क्योंकि वे कम संसाधनों के साथ खेती करती हैं।
यह रिपोर्ट सार्वजनिक डेटासेट और संस्थागत स्रोतों पर आधारित है, जिनमें पीएलएफएस 2023–24, कृषि जनगणना 2015–16, एफएओ, आईएलओ, भारत सरकार के स्रोत, आईएफसी और आर्या.एजी की जानकारियां शामिल हैं।
भारत में महिलाओं को रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र खेती ही है। देश की काम करने वाली महिलाओं में से 64.4 प्रतिशत खेती से जुड़ी हैं, जबकि 2017-18 में यह आंकड़ा 57 प्रतिशत था। ग्रामीण इलाकों में काम करने वाली महिलाओं के मामले में यह हिस्सेदारी बढ़कर 76.9 प्रतिशत हो जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे पुरुष खेती से अलग काम के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, महिलाएं खेतों के रोजमर्रा के कामकाज को संभालने की जिम्मेदारी ज्यादा उठा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, फिर भी, उन्हें उस हिसाब से पहचान नहीं मिली है। खेती-बाड़ी के काम में लगी कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी अब लगभग 48 प्रतिशत है, जो वर्ष 2017-18 में करीब 30 प्रतिशत थी। लेकिन वे भारत की खेती वाली जमीन के सिर्फ 11.72 प्रतिशत हिस्से पर खेती करती हैं और 13.96 प्रतिशत खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन की जोत की मालिक हैं। यानी, उनके योगदान और उनके नियंत्रण वाली जमीन के बीच चार गुना का अंतर है।
रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे खेतों की पैदावार, पुरुषों द्वारा चलाए जा रहे उसी आकार के खेतों की तुलना में 24 प्रतिशत कम हो सकती है। यह अंतर काबिलियत की वजह से नहीं, बल्कि ऋण और खेती के जरूरी सामान तक समान पहुंच न होने की वजह से है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला खेतिहर मजदूरों को पुरुषों के मुकाबले उसी काम के लिए 20-30 प्रतिशत कम मजदूरी मिलती है।
रिपोर्ट में महिलाओं को किसान के तौर पर मान्यता देने, महिला किसानों के लिए कृषि ऋण की सुविधाएं बढ़ाने, ड्रोन, सलाहकार सेवाओं और बाजार की प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ाने की सिफारिश की गई है।
भाषा राजेश राजेश अजय
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