कपड़ा मंत्रालय के हथकरघा गांव टैग से शरण गांव के कारीगरों के लिए कमाई के नए रास्ते खुले

कपड़ा मंत्रालय के हथकरघा गांव टैग से शरण गांव के कारीगरों के लिए कमाई के नए रास्ते खुले

कपड़ा मंत्रालय के हथकरघा गांव टैग से शरण गांव के कारीगरों के लिए कमाई के नए रास्ते खुले
Modified Date: August 8, 2026 / 06:59 pm IST
Published Date: August 8, 2026 6:59 pm IST

शिमला, आठ अगस्त (भाषा) एक ओर जहां हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में कारीगरों की कमी से हथकरघा का काम कम हो रहा है, वहीं कुल्लू जिले में शरण गांव केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय से ‘हथकरघा गांव’ का टैग मिलने के बाद एक प्रमुख केंद्र के तौर पर उभरा है। इससे पारंपरिक कारीगरों, खासकर महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई का मौका बना है।

शरण को वर्ष 2020 में देश भर के 11 गांवों में एक ‘स्पेशलाइज्ड क्राफ्ट हैंडलूम विलेज’ के तौर पर पहचाना गया था। इसकी वजह यहां की पारंपरिक लकड़ी वाली ‘कथ-कुनी’ वास्तुकला और स्थानीय बुनकरों का सक्रिय समुदाय है।

इस गांव को ‘हथकरघा गांव’ की पहचान इसलिए मिली क्योंकि इसने कई पैमानों को पूरा किया, जैसे कि पर्यटन सर्किट पर होना (जिससे ग्रामीण पर्यटन के साथ शिल्प उत्पादन को सफलतापूर्वक जोड़ा जा सके), राज्य सरकार की सिफारिश, बुनियादी ढांचे की व्यवहार्यता और सांस्कृतिक तथा विरासत का महत्व। यह गांव बुनाई की अनोखी और पारंपरिक क्षेत्रीय परंपराओं को भी दर्शाता है।

यह गांव पारंपरिक खेती और निजी इस्तेमाल के लिए पट्टू, शॉल, टोपी और मफलर बुनने से आगे बढ़कर अब अपने हथकरघा उत्पादों को बाजार में बेचने लगा है। जमागदानी स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की सपना ठाकुर ने कहा कि ‘हैंडलूम विलेज’ या ‘हथकरघा गांव’ का टैग मिलने के बाद हथकरघा उत्पादों की बिक्री काफी बढ़ी है और महिलाएं अब अपने उत्पादों को बाजार में बेच रही हैं।

शरण गांव की एक और महिला कारीगर दीक्षा ने कहा कि पहले महिलाएं सिर्फ खेती-बाड़ी के कामों में लगी रहती थीं और अपने इस्तेमाल के लिए हथकरघा उत्पाद बनाती थीं, लेकिन अब हालात बदल गए हैं और उनके उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध हैं, जिससे उनकी कमाई भी बढ़ी है।

भाषा राजेश राजेश पाण्डेय

पाण्डेय


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