शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना में व्यापक निवेश से मध्य-आय जाल से निकल सकता है भारत: थॉमस पिकेटी

शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना में व्यापक निवेश से मध्य-आय जाल से निकल सकता है भारत: थॉमस पिकेटी

शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना में व्यापक निवेश से मध्य-आय जाल से निकल सकता है भारत: थॉमस पिकेटी
Modified Date: September 15, 2026 / 03:05 pm IST
Published Date: September 15, 2026 3:05 pm IST

(बिजय कुमार सिंह)

नयी दिल्ली, 15 सितंबर (भाषा) फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने मंगलवार को कहा कि भारत शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करके ‘मध्य-आय के जाल’ से निकल सकता है। उन्होंने समावेशी और टिकाऊ वृद्धि के लिए वैश्विक गठबंधनों में भारत की भागीदारी को भी जरूरी बताया।

पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में प्रोफेसर और वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के सह-निदेशक पिकेटी ने पीटीआई-भाषा के साथ बातचीत में कहा, ‘‘भारत मध्य-आय जाल से निकल सकता है, लेकिन इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसंरचना में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होगी।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमें भारत की व्यापक अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में भागीदारी भी चाहिए, जो अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास मॉडल का समर्थन करें।’’

‘मध्य-आय जाल’ उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी देश के लिए अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी के कारण श्रम-प्रधान वस्तुओं के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है, जबकि कम उत्पादकता के कारण वह उच्च मूल्यवर्धित गतिविधियों में भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता। ऐसे में आर्थिक वृद्धि सुस्त पड़ जाती है, मजदूरी स्थिर या घटने लगती है और असंगठित अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ने लगता है।

यह पूछे जाने पर कि क्या भारत कृत्रिम मेधा (एआई) और प्रौद्योगिकी बदलावों से बढ़ती आर्थिक असमानता के बीच इस जाल से बाहर निकल सकता है, पिकेटी ने एआई के लोकतांत्रिक नियमन की वकालत की। उन्होंने एआई और अन्य क्षेत्रों के भौतिक संसाधन उपयोग का उचित आकलन करने की जरूरत भी बताई।

एआई के भू-राजनीतिक संघर्ष का अगला केंद्र बनने की संभावना पर उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में वास्तविक मुद्दे कम-कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा प्रणालियों की ओर बदलाव और अर्थव्यवस्था के भौतिक क्षेत्रों से कम भौतिक संसाधन वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ने से जुड़े हैं।

पिकेटी ने कहा, ‘‘अगर दुनिया अपने भौतिक संसाधन उपयोग में भारी कमी नहीं करती है तो धरती पर जीवन बेहद कठिन हो जाएगा, खासकर भारत जैसे देश में। भविष्य के भू-राजनीतिक संघर्ष का वास्तविक क्षेत्र एआई नहीं, बल्कि जलवायु हो सकता है।’’

उन्होंने कहा कि एआई को लेकर मौजूदा जुनून ध्यान भटकाने वाला है और यह पर्यावरणीय संकट को बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘बहुत अधिक संसाधन और शक्ति कुछ प्रौद्योगिकी अरबपतियों के हाथों में केंद्रित हो गई है, जो टिकाऊ और समावेशी विकास के मुद्दे से काफी दूर हैं।’’

उन्होंने कहा कि आर्थिक न्याय और जलवायु क्षतिपूर्ति की मांग भविष्य में बढ़ेगी और भारत के लिए इस आंदोलन तथा टिकाऊ विकास मॉडल के पक्ष में नए वैश्विक बहुमत के निर्माण में भाग लेना महत्वपूर्ण है।

विश्व बैंक की 2024 की विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार, चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका समेत 100 से अधिक विकासशील देश आने वाले दशकों में उच्च-आय वाले देशों की श्रेणी में पहुंचने की दिशा में गंभीर बाधाओं का सामना कर रहे हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, कई अर्थव्यवस्थाएं प्रौद्योगिकी अपनाने और नवाचार पर आधारित अधिक उन्नत विकास मॉडल की ओर बदलाव नहीं कर पातीं और मध्यम आय के स्तर पर ठहर जाती हैं। यही कारण है कि 1990 के बाद से केवल 34 मध्य-आय वाली अर्थव्यवस्थाएं ही उच्च-आय का दर्जा हासिल कर पाई हैं।

भाषा प्रेम प्रेम अजय

अजय


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