एफटीए के इस्तेमाल में विकसित देशों से काफी पीछे है भारत, कार्यान्वयन सुधारने की जरूरत : विशेषज्ञ

एफटीए के इस्तेमाल में विकसित देशों से काफी पीछे है भारत, कार्यान्वयन सुधारने की जरूरत : विशेषज्ञ

एफटीए के इस्तेमाल में विकसित देशों से काफी पीछे है भारत, कार्यान्वयन सुधारने की जरूरत : विशेषज्ञ
Modified Date: May 24, 2026 / 12:02 pm IST
Published Date: May 24, 2026 12:02 pm IST

नयी दिल्ली, 24 मई (भाषा) मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के मोर्चे पर भारत की अगली प्राथमिकता इनके व्यावहारिक कार्यान्वयन और निर्यातकों को इन करारों के इस्तेमाल में मदद की होनी चाहिए। विशेषज्ञों ने यह राय जताई है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े एफटीए किए हैं, लेकिन अब असली चुनौती इन समझौतों का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब सरकार और उद्योग जगत का ध्यान ‘एफटीए पर हस्ताक्षर’ से ‘एफटीए के कार्यान्वयन’ पर होना चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में एफटीए की उपयोग दर अभी लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है, जबकि विकसित देशों में यह 70-80 प्रतिशत तक है। यानी भारत ने जिन देशों के साथ कम शुल्क या शुल्क-मुक्त पहुंच हासिल की है, उसका पूरा फायदा भारतीय निर्यातक अभी नहीं उठा पा रहे हैं।

डेलॉयट इंडिया के भागीदार गुलजार दिदवानिया ने कहा कि भारत को अब यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एफटीए के तहत मिले लाभ वास्तव में सीमा शुल्क स्तर पर इस्तेमाल हों और निर्यात बढ़ाने में मदद करें। उन्होंने कहा कि भारत ने सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, आसियान और ईएफटीए जैसे बाजारों के साथ एफटीए किए हैं। इसके अलावा ओमान, न्यूजीलैंड, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ भी ऐसे करार किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता अब इन एफटीए से मिलने वाले लाभ को वास्तविक रूप से कार्यान्वित करने पर होनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति संकट के दौर में एफटीए भारत के लिए नए व्यापारिक रास्ते खोल सकते हैं। इसके लिए भारत को निर्यात बाजारों और उत्पादों में विविधता लानी होगी तथा घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी।

शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी के भागीदार रुद्र कुमार पांडेय ने कहा कि सूक्ष्म, लघु एवं मझोला उद्यम (एमएसएमई) कंपनियों में अभी एफटीए को लेकर जागरूकता कम है और कई समझौतों के लिए जरूरी प्रमाणन ढांचा भी कमजोर है। उन्होंने कहा कि हर संभावित निर्यातक को यह समझना चाहिए कि उसे किस बाजार में किस तरह की रियायत मिल सकती है और उसका लाभ लेने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘अभी हमारी प्राथमिकता एफटीए के इस्तेमाल की होनी चाहिए।’’

विशेषज्ञों का कहना है कि कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्युटिकल्स और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता सुधारने के लिए उत्पादन से जुड़ी (पीएलआई) जैसी योजनाओं का अतिरिक्त समर्थन मिलना चाहिए।

पांडेय ने कहा कि इसके अलावा भारत को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों, कार्बन अकाउंटिंग और हरित नियमों के अनुरूप अपनी घरेलू प्रमाणन प्रणाली को मजबूत करना होगा। खासकर यूरोपीय बाजारों में भविष्य में पर्यावरण से जुड़े नियम अधिक सख्त हो सकते हैं।

भाषा अजय अजय

अजय


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