डिजिटल वित्त में तेज वृद्धि के साथ जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने की जरूरत: शेट्टी
डिजिटल वित्त में तेज वृद्धि के साथ जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने की जरूरत: शेट्टी
नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सी एस शेट्टी ने सोमवार को आगाह किया कि डिजिटल वित्त, मंच के जरिये कर्ज और एआई संचालित जोखिम मूल्यांकन में तेजी से हो रही वृद्धि वित्तीय प्रणाली में नई कमजोरियां पैदा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि नवोन्मेष के साथ-साथ जोखिम प्रबंधन को चाक-चौबंद भी बनाये जाने की जरूरत है।
शेट्टी ने उद्योग मंडल सीआईआई के वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन में कहा कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को संचालन रूपरेखा, पूंजी बफर, साइबर सुरक्षा क्षमताओं और जोखिम प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करना जारी रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे बैंकिंग प्रणाली प्रौद्योगिकी परिवर्तन से गुजर रही है, भारत की वित्तीय संरचना को मजबूत बने रहना होगा और जो भी नवान्मेष हो, उसमें एक भरोसा अंतर्निहित होना चाहिए।
शेट्टी ने ‘वित्तपोषण का भविष्य’ विषय पर एक सत्र में कहा, ‘‘जैसे-जैसे भारत की वित्तीय प्रणाली का विस्तार और जटिलता बढ़ रही है, भरोसा इसका मूलभूत सिद्धांत बना रहना चाहिए। विश्वास के बिना नवोन्मेष टिकाऊ नहीं हो सकता। डिजिटल वित्त, मंच के जरिये कर्ज और एआई-आधारित जोखिम मूल्यांकन की तीव्र वृद्धि नए अवसर तो सृजित करती है, लेकिन साथ ही नई कमजोरियां भी पैदा करती है।’’
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संचालन और जोखिम प्रबंधन रूपरेखा नवोन्मेष के साथ-साथ विकसित नहीं होते हैं, तो साइबर जोखिम और परिचालन कमजोरियां बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं।
शेट्टी ने कहा कि भारत में डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार और एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम) जैसे विभिन्न क्षेत्रों में वित्तीय संस्थानों के जरिये ऋण पहुंच को मजबूत करने के साथ-साथ जनता का विश्वास बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘गति कभी भी सुरक्षा की कीमत पर नहीं आनी चाहिए और नवोन्मेष कभी भी समावेश को कमजोर करने वाला नहीं होना चाहिए। अंततः, भारतीय ग्राहक को हमारी वित्तीय प्रणाली को लेकर एक भरोसा बना रखना चाहिए। यही विश्वास हमारी सबसे बड़ी संस्थागत संपत्ति है।’’
एसबीआई चेयरमैन ने यह भी कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को बड़े पैमाने पर पूंजी जुटाने की आवश्यकता होगी। अनुमानों के अनुसार आने वाले दशकों में 3,000 लाख करोड़ रुपये से 3,500 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी। अकेले 2035 तक लगभग 600 लाख करोड़ रुपये से 650 लाख करोड़ रुपये जुटाने होंगे।
शेट्टी ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए केवल बैंक ही पर्याप्त नहीं होंगे। उन्होंने बॉन्ड बाजारों को और अधिक मजबूत बनाने तथा म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड और बीमा कंपनियों की अधिक भागीदारी की जरूरत बतायी।
भाषा रमण अजय
अजय

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