कम दाम पर ईंधन बिक्री से पेट्रोलियम कंपनियों को रोजाना हो रहा 1,700 करोड़ रुपये का नुकसान

कम दाम पर ईंधन बिक्री से पेट्रोलियम कंपनियों को रोजाना हो रहा 1,700 करोड़ रुपये का नुकसान

कम दाम पर ईंधन बिक्री से पेट्रोलियम कंपनियों को रोजाना हो रहा 1,700 करोड़ रुपये का नुकसान
Modified Date: May 10, 2026 / 02:51 pm IST
Published Date: May 10, 2026 2:51 pm IST

नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों पर भारी पड़ रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (एचपीसीएल) जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनियां पिछले 10 सप्ताह से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस एलपीजी की बिक्री पुराने दामों पर कर रही हैं, जिससे उन्हें प्रतिदिन 1,600-1,700 करोड़ रुपये का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा है।

मामले से जुड़े सूत्रों ने बताया कि 10 सप्ताह में इन कंपनियों की कुल ‘अंडर-रिकवरी’ एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। अंडर-रिकवरी का अर्थ लागत से कम मूल्य पर बिक्री से है।

कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम दो साल पुराने स्तर पर बने हुए हैं। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक रहा है। वहीं, मार्च में घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम 60 रुपये बढ़ाए गए थे, लेकिन इसके बावजूद इसकी कीमत वास्तविक लागत से कम बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार, पेट्रोलियम कंपनियों को अब कच्चे तेल की खरीद और परिचालन जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक कार्यशील पूंजी जुटानी पड़ सकती है। यदि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो कंपनियों को कुछ पूंजीगत व्यय योजनाओं की प्राथमिकताओं में बदलाव करना पड़ सकता है।

हालांकि, रिफाइनरी विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा ढांचे, एथनॉल मिश्रण, जैव ईंधन और ऊर्जा बदलाव से जुड़ी रणनीतिक परियोजनाओं को सरकार की ओर से समर्थन से जारी रखा जाएगा।

एक अन्य सूत्र ने कहा कि पेट्रोलियम कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव रहने से भविष्य में रिफाइनरी, पाइपलाइन, रणनीतिक भंडारण और स्वच्छ ईंधन परियोजनाओं में निवेश प्रभावित हो सकता है।

सूत्रों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का निर्णय अब सरकार के स्तर पर लिया जाना है। उनका कहना है कि ईंधन मूल्य वृद्धि लगभग अपरिहार्य हो गई है, लेकिन इसकी मात्रा और समय का निर्धारण सरकार करेगी।

पश्चिम एशिया संकट के बाद जापान और ब्रिटेन सहित कई देशों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है, जबकि भारत में कीमतें स्थिर रखी गई हैं।

युद्ध के कारण भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत, एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस आयात का 65 प्रतिशत प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद पेट्रोलियम कंपनियों ने देश में ईंधन आपूर्ति बनाए रखी है।

उपभोक्ताओं पर बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने भी उत्पाद शुल्क में कटौती की है। पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर तीन रुपये और डीजल पर 10 रुपये से घटाकर शून्य कर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, इस कदम से सरकार को हर महीने लगभग 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है।

भाषा अजय अजय पाण्डेय

पाण्डेय


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