देश में ‘रूफटॉप’ सौर क्षमता बढ़ रही, लेकिन राज्यों मं यह वृद्धि संतुलित नहीं: रिपोर्ट

देश में ‘रूफटॉप’ सौर क्षमता बढ़ रही, लेकिन राज्यों मं यह वृद्धि संतुलित नहीं: रिपोर्ट

देश में ‘रूफटॉप’ सौर क्षमता बढ़ रही, लेकिन राज्यों मं यह वृद्धि संतुलित नहीं: रिपोर्ट
Modified Date: June 23, 2026 / 07:07 pm IST
Published Date: June 23, 2026 7:07 pm IST

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) देश में छतों पर लगने वाली सौर प्रणाली की क्षमता तेजी से बढ़ रही है लेकिन यह बढ़ोतरी संतुलित नहीं है। ज्यादातर बढ़ोतरी पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हुई है, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर के बड़े हिस्से अब भी काफी पीछे हैं। एक विश्लेषण में यह बात सामने आई है।

गुजरात, महाराष्ट्र और केरल में मार्च तक छतों पर लगने वाली सौर ऊर्जा प्रणाली (रूफटॉप) की क्षमता क्रमशः 6,882 मेगावाट, 5,442 मेगावाट और 1,850 मेगावाट थी। वहीं, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम में यह क्रमशः 156 मेगावाट, 67 मेगावाट, 95 मेगावाट और 344 मेगावाट थी।

रिपार्ट के अनुसार, इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि अगर भारत 2035 तक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की उत्सर्जन तीव्रता में 47 प्रतिशत की कटौती और 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म-आधारित बिजली क्षमता की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करना चाहता है, तो हर राज्य को अपनी रूफटॉप सोलर क्षमता बढ़ानी होगी।

बेंगलुरु स्थित शोध और परामर्श संस्था क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स (सीसीएफ) की रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘ रूफटॉप सोलर, बिना नई जमीन या पारेषण लाइन के मांग वाली जगह के पास साफ-सुथरी ऊर्जा क्षमता जोड़ने के सबसे तेज तरीकों में से एक है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए।’’

भारत की कुल रूफटॉप क्षमता मार्च तक 25.7 गीगावाट (एक गीगावाट बराबर 1,000 मेगावाट) तक पहुंच गई और अकेले 2026 की पहली तिमाही में 2.7 गीगावाट क्षमता जोड़ी गयी जो एक साल पहले की इसी तिमाही की तुलना में 125 प्रतिशत अधिक है।

रिपोर्ट के लेखकों के अनुसार, गुजरात, महाराष्ट्र और केरल जैसे पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों ने अच्छा प्रदर्शन किया है क्योंकि उन्होंने कई साल पहले ही सौर प्रणाली लगाने से जुड़े नेटवर्क, वित्त पोषण चैनल और ग्राहकों में जागरूकता बढ़ाने का काम शुरू कर दिया था।

एक और वजह यह है कि उनकी वितरण कंपनियां ‘नेट-मीटरिंग एप्लिकेशन’ को तेजी से प्रसंस्कृत करती हैं और रूफटॉप सोलर को एक संपत्ति के तौर पर देखती हैं।

‘नेट मीटरिंग’ एक बिलिंग प्रणाली है जिसमें सौर-ऊर्जा प्रणाली के मालिकों को उस बिजली के लिए क्रेडिट मिलता है जो वे ग्रिड में भेजते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्य कई वजहों से अब तक अपनी रूफटॉप सौर क्षमता बढ़ाने में नाकाम रहे हैं। ‘‘पूर्वी क्षेत्र के अधिकतर हिस्सों में, आर्थिक रूप से मुश्किलों का सामना कर रही बिजली वितरण कंपनियां धीमी और अधिक सतर्क हैं। विक्रेताओं का आकार छोटा है और घरों को कर्ज मिलने में दिक्कत होती है और सब्सिडी के बारे में जानकारी भी कम है।’’

विश्लेषकों का कहना है कि ये रुकावटें तब भी इसे अपनाने की दर को कम रखती हैं जब नीति और क्षमता दोनों मौजूद हों।

उनका मानना है कि रूफटॉप सोलर कम अपनाने की वजह सब्सिडी की रकम नहीं, बल्कि वितरण कंपनियों की कम क्षमता, मंजूरी में देरी, वित्त पोषण और वेंडर नेटवर्क और ग्राहकों में जागरूकता की कमी हो सकती है।

संस्थान के मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ. मनीष राम ने बयान में कहा, ‘‘भारत के 2035 के लक्ष्यों के लिए जरूरी है कि हर राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाए और यह सिर्फ सब्सिडी से नहीं होगा। जो राज्य पीछे रह गए हैं, उन्हें काम करने वाली बिजली वितरण कंपनियों, स्थानीय वेंडर (विक्रेता) और ऐसे ग्राहकों की जरूरत है जिन्हें भरोसा हो कि बचत असल में उनके बिल में दिखेगी…।’’

भाषा रमण अजय

अजय


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