दोहराएगा इतिहास, 1967 में भी बने थे यही हालात, विजया राजे सिंधिया ने कांग्रेस सरकार का कराया था तख्तापलट

दोहराएगा इतिहास, 1967 में भी बने थे यही हालात, विजया राजे सिंधिया ने कांग्रेस सरकार का कराया था तख्तापलट

दोहराएगा इतिहास, 1967 में भी बने थे यही हालात, विजया राजे सिंधिया ने कांग्रेस सरकार का कराया था तख्तापलट
Modified Date: November 29, 2022 / 08:45 pm IST
Published Date: March 11, 2020 8:50 am IST

भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में जो इस वक्त उथल-पुथल मची है इससे पहले भी सन 1967 में ठीक इसी तरह की स्थिति पैदा हुई थी।ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी राजमाता विजया राजे सिंधिया ने मध्य प्रदेश की डीपी मिश्रा की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभायी थी।

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इसके बाद ही मध्य प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ था। 1967 में कांग्रेस की सरकार को बहुमत मिला था और डीपी मिश्रा सीएम चुने गए थे। लेकिन बाद में पार्टी के 36 विधायकों ने विजयाराजे सिंधिया के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते हुए विपक्ष का दामन थाम लिया था। इससे बाद डीपी मिश्रा की सरकार गिर गई थी।

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राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपना पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर जीता था, लेकिन बाद में वह जनसंघ के साथ जुड़ गईं और पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शुमार रहीं। साल 1980 के चुनाव में विजयाराजे सिंधिया को रायबरेली में इंदिरा गांधी के सामने हार का सामना करना पड़ा था।

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सिंधिया की रिश्तेदार यशोधरा राजे सिंधिया और वसुंधरा राजे सिंधिया भी भाजपा की सदस्य हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया भी पहली बार साल 1971 में जनसंघ के टिकट पर ही संसद में पहुंचे थे। हालांकि राजीव गांधी के साथ निकटता होने के चलते माधवराव सिंधिया ने बाद में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी।

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मध्यप्रदेश में अभी ऐसे ही हालात बने हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही कांग्रेस के 22 विधायकों ने भी विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। जिसके चलते मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार के गिरने की आशंका पैदा हो गई है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया का सियासी सफर-

ज्योतिरादित्य सिंधिया की कहानी जो पूरे परिवार को फिर से भाजपा की शरण में ला रहा है। सिंधिया के सियासी सफर के बारे बात करें तो पिता के निधन के बाद उन्होंने उनकी पसंद वाली सीट से 2002 अपने करियर की शुरुआत की थी। कांग्रेस की टिकट पर उन्होंने 2002 से लेकर 2014 तक लगातार चार बार सांसद चुने गए।

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2019 में गुना की पुश्तैनी सीट पर उन्हें अपना ही शिष्य कहे जाने वाले भाजपा के केपी सिंह यादव से हार का सामना करना पड़ा। 1 लाख 25 हजार वोटों से हार ने ज्योतिरादित्य के राजनीतिक करियर पर सवाल उठा दिए क्योंकि, जहां एक ओर दिसंबर 2018 में जब मध्य प्रदेश में 72 साल के कमलनाथ के सामने 48 के युवा ज्योतिरादित्य को मौका नहीं मिला तो, वहीं पांच महीने बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी हार का सामना करना पड़ा और अपने ही प्रदेश में वे अपनी खुद की सीट नहीं बचा पाए थे। किसानों के कर्जमाफी के सवाल पर सड़क पर उतरे सिंधिया के खिलाफ कमलनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया देने से ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि सब कुछ ठीक नहीं है।


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