इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरेली हिंसा मामले में तौकीर रजा की जमानत अर्जी खारिज
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरेली हिंसा मामले में तौकीर रजा की जमानत अर्जी खारिज
प्रयागराज, आठ सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2025 के बरेली हिंसा मामले में जेल में बंद इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव ने सोमवार को दिए अपने आदेश में कहा कि घटना के बाद तौकीर रजा ने अपने भाषण में जो नारा लगाया, वह कानून के शासन तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता के खिलाफ 21 दिसंबर, 2025 को आरोपपत्र दाखिल किया गया था, लेकिन अभी आरोप तय किए जाने बाकी हैं। सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने के पक्ष में नहीं है इसलिए जमानत याचिका खारिज की जाती है।
तौकीर रजा पिछले साल सितंबर में बरेली में एक रैली के दौरान हुई हिंसा के संबंध में 13 अक्टूबर, 2025 से जेल में है।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, तौकीर रजा ने 26 सितंबर, 2025 को जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों से इस्लामिया इंटर कॉलेज परिसर में एकत्र होने का आह्वान किया था। यह आह्वान अधिकारियों द्वारा ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान के समर्थन में प्रस्तावित रैली निकालने की अनुमति नहीं दिए जाने के विरोध में किया गया था। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू रहने के बावजूद करीब 200-250 लोगों की भीड़ जमा हुई और उन्होंने मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहा की तरफ कूच किया।
तख्तियां लिए इस भीड़ ने भड़काऊ नारे लगाए और मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों की चेतावनी को नजरअंदाज किया। स्थिति उस समय बिगड़ गई जब कुछ लोग आक्रामक हो गए और आगे बढ़ने पर अड़ गए।
इसके बाद, उन्होंने पुलिस कर्मियों पर पथराव किया और तेजाब से भरी बोतलें फेंकी। इस दौरान भीड़ की ओर से पुलिस कर्मियों पर गोलीबारी भी की गई।
प्राथमिकी के मुताबिक, हिंसा में पुलिसकर्मियों की वर्दी फाड़ दी गई और दो अधिकारियों को चोटें भी आईं। यह भी आरोप है कि भीड़ की आक्रामकता से उस क्षेत्र में आतंक का माहौल बन गया जिससे पुलिस को आत्मरक्षा में हवा में गोलियां चलानी पड़ीं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए शुक्रवार की नमाज के मौके का फायदा उठाते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों को नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान पर एकत्रित होने को कहा ताकि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का विरोध किया जा सके और जिला मजिस्ट्रेट के जरिए राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा जा सके।’’
अदालत ने कहा, ‘‘स्थानीय प्रशासन से अनुमति लिए बगैर इतनी बड़ी सभा बुलाई गई थी। याचिकाकर्ता ने यह तर्क देने की भी कोशिश की कि अनुमति न मिलने और बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने के कारण इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान में एकत्रित होने का आह्वान रद्द कर दिया गया था। लेकिन तथ्य यह है कि मुस्लिम समुदाय से बड़ी संख्या में लोगों ने मार्च निकाला और पुलिस द्वारा रोके जाने पर उनके साथ मारपीट की गई और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया। इस कृत्य की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
अदालत ने कहा, ‘‘इस घटना के बाद याचिकाकर्ता द्वारा लोगों को धन्यवाद दिया गया और उनके कृत्यों की तारीफ की गई। इसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता।’’
अदालत ने कहा कि उसे राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी की इस दलील में दम नजर आया कि ‘‘गुस्ताख-ए-नबी के एक ही सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’’ का नारा कानून के शासन के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने के अलावा और कुछ नहीं है।
उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता की इस दलील से भी सहमति जताई कि उक्त नारे की तुलना ‘‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’’, ‘‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’’, ‘‘जय श्री राम’’ या ‘‘हर हर महादेव’’ जैसे अन्य नारों से नहीं की जा सकती। अदालत के अनुसार, ये नारे संबंधित धर्म के भगवान या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाले धार्मिक उद्घोष हैं।
भाषा सं राजेंद्र गोला
गोला

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