अस्थमा विशेषज्ञ ने फेफड़ों की गंभीर बीमारी के निदान के लिए विकसित किया नया उपकरण
अस्थमा विशेषज्ञ ने फेफड़ों की गंभीर बीमारी के निदान के लिए विकसित किया नया उपकरण
जयपुर, 12 अप्रैल (भाषा) जयपुर के एक अस्थमा रोग विशेषज्ञ ने अतिसंवेदनशीलता निमोनिया (एचपी) जैसी गंभीर फेफड़ों की बीमारी के सटीक और प्रारंभिक निदान के लिए एक नया उपकरण विकसित करने का दावा किया है। यह बीमारी फेफड़ों में तंतुमयता (फाइब्रोसिस) का कारण बन सकती है।
इस उपकरण ने 90 प्रतिशत से अधिक सटीकता प्रदर्शित की है और इसके शोध को अंतरराष्ट्रीय श्वसन रोग जर्नल ‘थोरैक्स’ में प्रकाशित किया गया है।
शोधकर्ता डॉ. शीतू सिंह के अनुसार एचपी इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (आईएलडी) का एक प्रमुख कारण है, जो फेफड़ों में स्थायी दाग पैदा करता है। यह रोग भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों-पाकिस्तान, श्रीलंका और भूटान में अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है और इसका निदान अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है।
उन्होंने बताया कि यह उपकरण एक प्रश्नावली के रूप में कार्य करता है, जिसमें मरीज के पर्यावरणीय संपर्क-जैसे पक्षियों, धूल और नमी वाले वातावरण का आकलन किया जाता है। यदि मरीज का स्कोर नौ या उससे अधिक आता है, तो एचपी होने की संभावना अधिक मानी जाती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि खांसी और सांस फूलने जैसे लक्षण अन्य श्वसन रोगों से मिलते-जुलते होने के कारण इस बीमारी की पहचान में भ्रम होता है, ऐसे में यह उपकरण शुरुआती और सटीक निदान में सहायक साबित हो सकता है।
उन्होंने बताया कि उपकरण को क्षेत्र-विशिष्ट पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है, ताकि जटिल फेफड़ों की बीमारियों के निदान को सरल बनाया जा सके। यह शोध दक्षिण एशियाई देशों के मरीजों के क्लिनिकल आंकड़ों पर आधारित है, जिससे इसकी व्यापक उपयोगिता सुनिश्चित होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार एचपी के प्रमुख लक्षणों में लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, थकान और वजन में कमी शामिल हैं, जो अन्य श्वसन रोगों से मिलते-जुलते होने के कारण इसकी समय पर पहचान कठिन हो जाती है।
भाषा
बाकोलिया रवि कांत

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