नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के दस दिन बाद भी मानसून सत्र औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है, जिससे ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार बिना नया सत्र बुलाए कोई अहम कानून पारित कराना चाहती है।
लोकसभा और राज्यसभा, दोनों की कार्यवाही 13 अगस्त को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई थी। आमतौर पर, अगले तीन से चार दिन के भीतर सत्रावसान कर दिया जाता है। हालांकि, रविवार सुबह तक मानसून सत्र के सत्रावसान की अधिसूचना जारी नहीं की गई थी।
इससे पहले, बजट सत्र 18 अप्रैल को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था और 20 अप्रैल को उसका सत्रावसान हुआ था।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति सरकार की सिफारिश पर सत्र बुलाते हैं और उसका सत्रावसान करते हैं।
ऐसी अटकलें हैं कि सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए उसमें संशोधन करने वाला विधेयक ला सकती है।
महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पारित करने की कोशिश बजट सत्र के दौरान नाकाम रही थी क्योंकि सरकार जरूरी संख्या बल नहीं जुटा पाई थी। विपक्षी दलों, खासकर दक्षिण के दलों ने चिंता जताई थी कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से लोकसभा में उनकी ताकत कम हो जाएगी।
उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए, सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लोकसभा सीटों की संख्या में एक समान 50 प्रतिशत की वृद्धि करने के फॉर्मूले पर काम किया है।
इस तरह का अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार स्वतंत्रता दिवस के बाद संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने की कोशिश कर सकती है।
संसद के मानसून सत्र के अवसान में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए, कांग्रेस ने रविवार को पूछा कि क्या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अब भी उस ‘‘दागदार’’ दो-तिहाई बहुमत की तलाश में हैं, जिससे वे एक विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित करा सकें।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने और उसके सत्रावसान (औपचारिक समाप्ति) के बीच आमतौर पर दो से चार दिन का अंतर होता है, हालांकि ऐसे भी कई उदाहरण हैं जब सत्र स्थगन और सत्रावसान एक ही दिन हुए हैं।
रमेश ने कहा कि लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित हुए दस दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी इसके सत्रावसान के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
कांग्रेस नेता ने ‘एक्स’ पर कहा, ‘‘यह सच है कि 2015 में मानसून सत्र के दौरान यह अंतर 28 दिन का था और 2021 में 20 दिन का। लेकिन तब कोई बुरी मंशा वाली चालें नहीं चली जा रही थीं।’’
रमेश ने कहा, ‘‘अब इतनी असामान्य देरी क्यों हो रही है? क्या केंद्रीय गृह मंत्री अभी भी उस ‘दागदार’ दो-तिहाई बहुमत की तलाश में हैं ताकि एक विशेष सत्र में परिसीमन पर संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराया जा सके?’’
भाषा वैभव रंजन
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