सीएपीएफ विधेयक से कैडर अधिकारी ‘द्वितीय श्रेणी’ के नागरिक बन जाएंगे: अधिकारियों ने गृहमंत्री से कहा

सीएपीएफ विधेयक से कैडर अधिकारी 'द्वितीय श्रेणी' के नागरिक बन जाएंगे: अधिकारियों ने गृहमंत्री से कहा

सीएपीएफ विधेयक से कैडर अधिकारी ‘द्वितीय श्रेणी’ के नागरिक बन जाएंगे: अधिकारियों ने गृहमंत्री से कहा
Modified Date: March 30, 2026 / 07:18 pm IST
Published Date: March 30, 2026 7:18 pm IST

नयी दिल्ली, 30 मार्च (भाषा) केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों के एक समूह ने ज्ञापन देकर गृह मंत्री अमित शाह से सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि यह विधेयक उन्हें उस संगठन के भीतर ‘‘द्वितीय श्रेणी का नागरिक’’ बना देगा, जिसमें वे सेवा कर रहे हैं।

अधिकारियों ने दलील दी कि यह विधेयक प्रतिनियुक्ति पर आए भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों के लिए शीर्ष नेतृत्व की भूमिकाएं आरक्षित करके ‘‘अदृश्य अवरोध’ को मजबूत करता है, और कैडर अधिकारियों को अपने स्वयं के संगठनों का नेतृत्व करने से स्थायी रूप से रोकता है।

‘पीटीआई-भाषा’ ने 2011-2016 बैच के अधिकारियों द्वारा लिखे गए एक-पृष्ठ के इन पत्रों को पिछले सप्ताह देखे हैं।

ऐसा ही एक पत्र सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट बिभोर कुमार सिंह का है, जिन्हें 2022 में बिहार में नक्सल-विरोधी अभियान के दौरान असाधारण वीरता प्रदर्शित करने के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था, जो देश का तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।

अधिकारियों ने कहा कि ये पत्र प्रभावित होने वाले अधिकारियों द्वारा ‘उचित माध्यम’ से उनके मुख्यालय को भेजे गए थे, ताकि उन्हें आगे गृह मंत्री को भेजा जा सके, जबकि ‘अग्रिम’ प्रतियां व्यक्तिगत ईमेल के माध्यम से गृह मंत्री को भेजी गई थीं।

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने पिछले सप्ताह संसद में सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 पेश किया, जिसका उद्देश्य गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) का संचालन करना है।

इन बलों में कुल करीब 10 लाख जवान कार्यरत हैं और इन्हें कानून-व्यवस्था संबंधी विभिन्न कर्तव्यों, सीमा सुरक्षा जैसे आंतरिक सुरक्षा कार्यों, आतंकवाद और उग्रवाद का मुकाबला करने तथा चुनाव कराने के लिए तैनात किया जाता है।

अधिकारियों ने अपने पत्रों में कहा कि विधेयक के प्रावधान ‘दमनकारी’ हैं और यदि ‘प्रतिनियुक्ति’ और ‘प्रशासनिक संरक्षण’ को ‘विशेषज्ञता’ और ‘क्षेत्रीय अनुभव’ पर प्राथमिकता दी जाती है तो उनके लिए ‘आत्मसम्मान’ के साथ अपनी सेवा जारी रखना ‘असंभव’ होगा।

उन्होंने शाह से अनुरोध किया है कि विधेयक पारित होने से पहले इस पर पुनर्विचार किया जाए।

अधिकारियों ने कहा कि यह विधेयक कैडर अधिकारियों के ‘मनोबल को तोड़ेगा’ और उनकी वित्तीय सुरक्षा के लिए भी संभावित ‘खतरा’ पैदा करेगा।

अधिकारियों ने इस व्यवस्था को ‘अदृश्य अवरोध’ करार देते हुए कहा कि महानिदेशक (डीजी) और विशेष महानिदेशक (एसडीजी) के शीर्ष पद आईपीएस अधिकारियों के लिए 100 प्रतिशत आरक्षित करने का प्रावधान है, जिसका अभिप्राय है कि कैडर अधिकारी, अपनी पूर्ण पात्रता और सेवा के बावजूद, कभी भी अपने संगठनों का नेतृत्व नहीं कर पाएंगे।

अधिकारियों ने दलील दी कि सरकार सीएपीएफ कैडर के अधिकारियों को उनके अपने सेवा अधिकारों से वंचित करके उन्हें ‘द्वितीय श्रेणी के नागरिक’ बना देगी।

सीएपीएफ के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कहा है कि इस विधेयक का उद्देश्य मई 2025 के उच्चतम न्यायालय के एक आदेश को ‘निष्प्रभावी’ करना है। उस आदेश में कहा गया था कि सीएपीएफ कैडर के अधिकारियों की पदोन्नति में देरी से उनके मनोबल पर ‘प्रतिकूल’ प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, कुछ सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारियों ने अखबारों में संपादकीय लिखकर विधेयक को ‘महत्वपूर्ण’ बताया है। उन्होंने कहा कि चूंकि वे अखिल भारतीय सेवा से संबंधित हैं, इसलिए सीएपीएफ में उनकी प्रतिनियुक्ति राज्य पुलिस बलों के साथ सुचारू समन्वय के लिए ‘अत्यंत आवश्यक’ है।

भाषा धीरज सुरेश

सुरेश


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