Caste Census 2026: जाति जनगणना पर अब तक का सबसे बड़ा अपडेट.. मोदी सरकार ने संसद में बताया, इस बारें में जुटाई जाएगी लोगों से जानकारी

जाति जनगणना का अर्थ है देश की पूरी आबादी में प्रत्येक जाति/समुदाय की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का व्यवस्थित डेटा एकत्र करना। 1931 के बाद से भारत में सभी जातियों (विशेषकर ओबीसी) की व्यापक जनगणना नहीं हुई है।

Caste Census 2026: जाति जनगणना पर अब तक का सबसे बड़ा अपडेट.. मोदी सरकार ने संसद में बताया, इस बारें में जुटाई जाएगी लोगों से जानकारी

Caste Census 2026 || Image- Sansad TV

Modified Date: February 4, 2026 / 06:28 pm IST
Published Date: February 4, 2026 6:22 pm IST
HIGHLIGHTS
  • जनगणना 2027 में जाति गणना तय
  • दूसरे चरण में दर्ज होगी जाति
  • केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट की

नई दिल्ली: जनगणना 2027 के तहत जाति गणना को लेकर चल रहे असमंजस को दूर करते हुए केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जनगणना के दूसरे चरण में जाति से संबंधित आंकड़े भी जुटाए जाएंगे। (Caste Census 2026) गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि भारत में जनगणना की प्रक्रिया परंपरागत रूप से दो चरणों में पूरी की जाएगी।

22 जनवरी को जारी हुई थी अधिसूचना

उन्होंने बताया कि पहले चरण में हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन (HLO) कराया जाएगा। इस चरण में प्रत्येक घर की आवासीय स्थिति, संपत्ति, उपलब्ध सुविधाएं और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारियां एकत्र की जाएंगी। राय ने कहा कि इस चरण से जुड़े प्रश्नों को 22 जनवरी 2026 को अधिसूचित कर दिया गया है

इसके बाद जनगणना का दूसरा चरण जनसंख्या गणना (Population Enumeration – PE) होगा। (Caste Census 2026) इस चरण में प्रत्येक व्यक्ति की जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां ली जाएंगी। गृह राज्य मंत्री ने साफ किया कि इसी चरण में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी।

तमिनाडु सरकार का अभ्यावेदन शामिल

राय ने यह भी बताया कि जाति गणना को लेकर कई राज्यों और संगठनों से सुझाव व मांगें प्राप्त हुई हैं, जिनमें तमिलनाडु सरकार की ओर से भेजे गए अभ्यावेदन भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दूसरे चरण के लिए प्रश्नावली, जिसमें जाति संबंधी प्रश्न भी होंगे, जनगणना शुरू होने से पहले तय कर अधिसूचित की जाएगी और पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संपन्न होगी।

याचिका पर सुनवाई से SC का इंकार

उच्चतम न्यायालय ने 2027 की सामान्य जनगणना में नागरिकों की जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से सोमवार को इनकार कर दिया।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्र और भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय से जनहित याचिका दायर करने वाले शिक्षाविद् आकाश गोयल द्वारा इस मुद्दे पर दिए गए सुझावों पर विचार करने को कहा। गोयल का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने किया।

गुप्ता ने कहा कि नागरिकों के जाति संबंधी विवरण को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले एक पारदर्शी प्रश्नपत्र को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि जाति संबंधी आंकड़ों की पहचान के लिए ‘‘पहले से तय कोई आंकड़ा’’ नहीं है। पीठ ने कहा, ‘‘जनगणना की प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके तहत बनाए गए 1990 के नियमों के अनुसार संचालित होती है जो प्रतिवादी प्राधिकारियों को जनगणना करने के विवरण और तौर-तरीके तय करने का अधिकार देते हैं।’’

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हमारे पास इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ता और ऐसे ही विचार रखने वाले कई अन्य लोगों द्वारा जताई गई आशंका के मद्देनजर, प्रतिवादी प्राधिकारी किसी भी प्रकार की गलती से बचने के लिए क्षेत्र के विशेषज्ञों की सहायता एवं सहयोग से एक मजबूत व्यवस्था विकसित कर चुके होंगे। हमें लगता है कि याचिकाकर्ता ने महापंजीयक को दिए गए प्रतिवेदन के जरिए कुछ प्रासंगिक मुद्दे भी उठाए हैं…।’’ पीठ ने कहा कि प्राधिकारी कानूनी नोटिस एवं याचिका में उठाए गए सुझावों पर विचार कर सकते हैं और इसी के साथ उसने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।

वर्ष 2027 की जनगणना आधिकारिक तौर पर 16वीं राष्ट्रीय जनगणना है। यह 1931 के बाद पहली बार व्यापक जातिगत गणना को शामिल करने वाली और देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी।

क्या है जाति जनगणना?

जाति जनगणना का अर्थ है देश की पूरी आबादी में प्रत्येक जाति/समुदाय की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का व्यवस्थित डेटा एकत्र करना। 1931 के बाद से भारत में सभी जातियों (विशेषकर ओबीसी) की व्यापक जनगणना नहीं हुई है, जिसे अब न्यायसंगत नीतियां, आरक्षण निर्धारण और सामाजिक न्याय के लिए जरूरी माना जा रहा है। इसे एक “ऐतिहासिक निर्णय” के रूप में भी देखा जा रहा है।

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