2021 की हार के बाद प्रचंड जीत से केरल में कांग्रेस-नीत यूडीएफ की ऐतिहासिक वापसी
2021 की हार के बाद प्रचंड जीत से केरल में कांग्रेस-नीत यूडीएफ की ऐतिहासिक वापसी
तिरुवनंतपुरम, पांच मई (भाषा) पांच वर्ष पहले की करारी हार से उबरते हुए कांग्रेस-नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने सोमवार को केरल में नाटकीय और ऐतिहासिक वापसी करते हुए नौ अप्रैल को हुए विधानसभा चुनाव में भारी जनादेश हासिल किया और राज्य की राजनीति में अपना वर्चस्व फिर स्थापित किया।
यूडीएफ की 102 सीटों पर जीत के साथ यह परिणाम केरल के चुनावी इतिहास में सबसे प्रभावशाली वापसी में से एक माना जा रहा है, जिसने माकपा-नीत वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) की लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश को निर्णायक रूप से रोक दिया।
यह जीत 2021 के बिल्कुल विपरीत है, जब मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने राज्य में सरकार बदलने की परंपरा को तोड़ते हुए सत्ता बरकरार रखी थी और कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था।
140 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीट जीती हैं, जबकि माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने 35 सीट जीती हैं।
भाजपा ने राज्य में तीन सीट जीतकर एक बड़ी सफलता हासिल की और विधानसभा में अपना खाता खोला।
केंद्र में सत्ता से बाहर रहकर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लगातार हमलों का सामना कर रही कांग्रेस के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई थी, जिसके चलते उसे केरल में जमीनी स्तर से संगठन को फिर खड़ा करना पड़ा। इसके बाद खोई जमीन वापस पाने के लिए पांच वर्षों तक सुनियोजित प्रयास किए गए।
पुनरुत्थान में एक अहम मोड़ नेतृत्व परिवर्तन रहा, जब वी डी सतीशन ने नेता प्रतिपक्ष का पद संभाला। उन्होंने सत्तारूढ़ मोर्चे के खिलाफ आक्रामक और प्रभावी रुख अपनाते हुए कार्यकर्ताओं में भरोसा जगाया और विपक्ष की रणनीति को नया स्वरूप दिया।
यूडीएफ ने आंतरिक एकजुटता मजबूत करने, घटक दलों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करने और एकसमान चुनावी रणनीति बनाए रखने पर भी जोर दिया, जिसके परिणाम उपचुनावों, स्थानीय निकाय चुनावों और लोकसभा चुनाव में दिखने लगे।
नौ अप्रैल के विधानसभा चुनाव में ‘टीम यूडीएफ’ के बैनर तले विपक्षी गठबंधन ने इसी रणनीति को अंतिम रूप देते हुए एकजुट और अनुशासित चेहरा पेश किया।
सतीशन की ‘पुथुयुग यात्रा’ और लक्षित अभियानों ने जमीनी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरी, वहीं के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला जैसे वरिष्ठ नेताओं ने रणनीति और क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाई।
यूडीएफ के प्रमुख सहयोगी ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (आईयूएमएल) ने भी जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया और 20 से अधिक सीटें जीतकर मजबूत प्रदर्शन किया।
मोर्चे की रणनीति में पारंपरिक वाम गढ़ों में सेंध लगाना भी शामिल था, जहां कई बड़े उलटफेर देखने को मिले। पय्यन्नूर, तालीपराम्बा और अंबालापुझा जैसे क्षेत्रों में मिली जीत ने सत्ता विरोधी लहर की तीव्रता को दर्शाया।
संगठनात्मक एकता, आक्रामक रणनीति, सामाजिक संतुलन और बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संतुलित दृष्टिकोण ने अंततः यूडीएफ को प्रचंड जनादेश दिलाया।
2021 में बिखरे विपक्ष से 2026 में एक मजबूत और संगठित चुनावी ताकत बनने तक का यूडीएफ का सफर एक आदर्श राजनीतिक वापसी का उदाहरण बन गया है। इसने न केवल केरल की वर्तमान राजनीतिक दिशा को बदला है, बल्कि राज्य में कांग्रेस को फिर से एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
भाषा मनीषा वैभव
वैभव

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