बहुओं को पारंपरिक व्यंजन की विधियां सिखाने की सतीशन की टिप्पणी पर विवाद पैदा

बहुओं को पारंपरिक व्यंजन की विधियां सिखाने की सतीशन की टिप्पणी पर विवाद पैदा

बहुओं को पारंपरिक व्यंजन की विधियां सिखाने की सतीशन की टिप्पणी पर विवाद पैदा
Modified Date: July 27, 2026 / 01:11 pm IST
Published Date: July 27, 2026 1:11 pm IST

तिरुवनंतपुरम, 27 जुलाई (भाषा) केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन की माताओं को पारंपरिक व्यंजन बनाने की विधियां अपनी बहुओं को भी सिखाने की सलाह देने वाली हालिया टिप्प्णी सोशल मीडिया पर विवाद का कारण बन गयी है। कई लोगों ने इस टिप्पणी को ‘‘महिला विरोधी’’ बताया है।

शनिवार को चेंगन्नूर में आयोजित ‘पम्पा फेस्टिवल ऑफ डायलॉग्स’ को संबोधित करते हुए सतीशन ने कहा, ‘‘मुझे कुछ माताओं से एक शिकायत है। उनके पास कुछ ऐसे पारंपरिक व्यंजन बनाने की विशेष कला होती है, जिन्हें केवल वही बनाना जानती हैं। लेकिन वे उन व्यंजनों की विधियां अपने बच्चों को नहीं सिखातीं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कम से कम उन्हें वे व्यंजन या तो अपने बच्चों को सिखाने चाहिए या फिर उस महिला को, जो आगे चलकर उनकी बहू बनेगी। इससे उन व्यंजनों की खासियत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।’’

केरल के पूर्व सामान्य शिक्षा मंत्री और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता वी. शिवनकुट्टी ने मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि यह केरल के स्कूलों में पढ़ाए जा रहे लैंगिक समानता के मूल्यों के विपरीत है।

शिवनकुट्टी ने फेसबुक पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘हमने पाठ्यपुस्तकों में यह बदलाव किया था कि घर के कामकाज हर व्यक्ति को करने चाहिए, चाहे वह पुरुष हो या महिला। इसके बावजूद…।’’

पूर्व मंत्री ने कहा कि घरेलू जिम्मेदारियां लिंग के आधार पर तय नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि पाठ्यक्रम में संशोधन इस उद्देश्य से किया गया था कि लड़के और लड़कियां, दोनों समान रूप से घरेलू कामकाज की जिम्मेदारी साझा करें।

लेखिका एस. शारदाकुट्टी ने भी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में सतीशन की टिप्पणी को पितृसत्तात्मक सोच का परिचायक बताया। उन्होंने कहा कि यह टिप्पणी समाज में पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध की अनदेखी करती है।

उन्होंने हाल में जंतर-मंतर पर महिलाओं के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों का उल्लेख किया और अपनी एक कविता साझा की, जिसमें महिलाओं पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी डाले जाने वाले घरेलू बोझ को प्रतीकात्मक रूप से अस्वीकार किया गया है।

भाषा गोला रंजन

रंजन


लेखक के बारे में