न्यायालय ने अदालतों में एआई के उपयोग पर मसौदा नियम जारी किए, हितधारकों से टिप्पणियां मांगीं

न्यायालय ने अदालतों में एआई के उपयोग पर मसौदा नियम जारी किए, हितधारकों से टिप्पणियां मांगीं

न्यायालय ने अदालतों में एआई के उपयोग पर मसौदा नियम जारी किए, हितधारकों से टिप्पणियां मांगीं
Modified Date: June 4, 2026 / 05:56 pm IST
Published Date: June 4, 2026 5:56 pm IST

नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) न्याय की शुचिता बनाए रखने के साथ अदालतों के कामकाज को आधुनिक बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग संबंधी नियमों का एक मसौदा जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि अदालत में एआई का क्या इस्तेमाल किया जा सकता है और क्या नहीं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘कोई भी न्यायिक फैसला सिर्फ ‘एल्गोरिद्म’ के आधार पर नहीं लिया जा सकता।’’

एल्गोरिद्म उस जटिल प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें सूचनाओं एवं आंकड़ों का मशीन आधारित संश्लेषण करके किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है।

शीर्ष अदालत की एआई समिति ने हितधारकों और आम जनता से 20 जून तक उनके सुझाव और राय देने को कहा है।

अदालतों में एआई के इस्तेमाल से संबंधित ये मसौदा नियम भारत के भीतर उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, और न्यायाधिकरणों व न्यायिक कार्य करने वाले वैधानिक आयोगों सहित सभी अदालतों के किसी भी न्यायिक, निर्णय संबंधी या प्रशासनिक कार्य में एआई के उपयोग, तैनाती या एकीकरण पर लागू होंगे।’’

शीर्ष अदालत ने अपने नोटिस में कहा, ‘‘इन नियमों का उद्देश्य एआई (एआई) के इस्तेमाल को नियंत्रित करना है, जो मनुष्य की सर्वोच्चता, पारदर्शिता, जवाबदेही, डेटा सुरक्षा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इसके साथ ही, यह भारत की पूरी न्यायिक प्रणाली में जिम्मेदारी के साथ एआई को अपनाने के लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार करता है।’’

पैंतीस पन्नों के इस मसौदे में प्रौद्योगिकी के लिए एक स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ तय करने का प्रस्ताव दिया गया है, जो यह दर्शाती है कि एआई भले ही सहायता कर सकता है, लेकिन वह कभी भी इंसान के दिमाग की जगह नहीं ले सकता।

नियमों में से एक के मुताबिक, अदालती कामकाज में एआई का इस्तेमाल हर समय पूरी तरह से मनुष्य के निर्णय और न्यायिक शक्ति के अधीन ही रहेगा। हर एआई प्रणाली सिर्फ मदद करने वाले साधन के रूप में काम करेगी। यह कानूनी रूप से नियुक्त किसी भी न्यायिक अधिकारी की स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति की जगह नहीं ले सकती और न ही उसे प्रभावित कर सकती है। कानून, तथ्य और न्याय से जुड़े मामलों पर अंतिम फैसला सुनाने का पूरा अधिकार सिर्फ और सिर्फ संबंधित अदालत के न्यायिक अधिकारियों के पास ही सुरक्षित रहेगा।

नियम-20 में कहा गया है कि अदालती फैसलों तक पहुँचने के लिए एआई का इस्तेमाल करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है, जैसे कि फैसला सुनाना, सजा तय करना या गवाहों की विश्वसनीयता को आंकना।

इस मसौदे में मुकदमों के भारी बोझ से निपटने के लिए न्यायपालिका द्वारा एआई को अपनाए जाने का एक रणनीतिक मसौदा तैयार किया गया है।

इसमें कहा गया है कि अदालतों को मामलों के प्रबंधन, अदालती कार्यवाही के दौरेान बोली जाने वाली बातों को अपने आप लिखित रूप में बदलने, कानूनी दस्तावेजों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करने, कानूनी शोध में सहायता लेने और अदालती प्रक्रियाओं को समझने में वादियों की मदद के लिए ‘गाइडेड चैटबॉट्स’ का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

अन्य चीजों के अलावा, एआई का उपयोग कानूनी शोध और पुराने फैसलों को खोजने, उद्धरणों के सत्यापन, दलीलों, फैसलों व दस्तावेजों का सारांश तैयार करने, और फैसलों, आदेशों व कानूनी दस्तावेजों के अनुवाद के लिए किया जा सकता है।

इस मसौदे में उन क्षेत्रों या कामों को भी साफ तौर पर अलग किया गया है, जहाँ एआई के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक होगी।

इसमें कहा गया है कि सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना, और जहाँ लागू हो, डेटा सुरक्षा कानून के नियमों का पालन किए बिना, किसी भी व्यक्ति के निजी डेटा का उपयोग किसी भी एआई प्रणाली को सिखाने, उसकी जाँच करने या उसमें सुधार करने के लिए नहीं किया जाएगा।

भाषा नेत्रपाल माधव

माधव


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