आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के मापदंड परिभाषित करना कठिन है: न्यायालय
आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के मापदंड परिभाषित करना कठिन है: न्यायालय
नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी विशेष प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करने के लिए मापदंड परिभाषित करना न्यायिक मंच के लिए यदि असंभव नहीं, तो बहुत मुश्किल है।
प्रधान न्यायाधीश न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि यदि किसी विशेष हिंदू धार्मिक संप्रदाय में कुछ परंपराओं का पालन किया जाता है, तो उन सभी को ‘‘अनिवार्य धार्मिक परंपरा’’ नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य को प्रभावित करती हों।
संविधान के तहत, किसी भी धर्म के किसी विशेष संप्रदाय की धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण प्राप्त है, जब तक कि वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य के विरुद्ध ना हों।
संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति पी. बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची में शामिल थे। पीठ ने कहा कि संविधान में ‘आवश्यक’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है।
एक पक्षकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि किसी धर्म को केवल किसी सम्प्रदाय के नियमों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता और धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार निश्चित रूप से यह शामिल करता है कि आस्थावान लोग अपने लिए क्या तय करते हैं।
उन्होंने कहा, “वे कैसे और कब उपासना करें, यह सब आस्थावानों पर निर्भर होना चाहिए। इसलिए कृपया कोई नए विचार न जोड़ें और पुराने को नए से न बदलें।”
उन्होंने कहा, “इसे ऐसा साधन न बनाइए जो भविष्य में समस्याएं पैदा करे। कृपया यह निर्णय उस सम्प्रदाय पर ही छोड़ दीजिए कि वे कैसे उपासना करना चाहते हैं।” द्विवेदी ने यह बात शबरिमला मामले में 2018 के बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए कहा जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को उस प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अदालत को यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि धर्म में लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं। उन्होंने कहा, ‘‘लोग किसी विशेष सम्प्रदाय या मंदिर से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, तो अगर उनकी भावनाएं आहत होती हैं तो वे बहुत तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं।’’
उन्होंने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में बहुत सावधानी और नरमी से काम लेना चाहिए और न्यायिक समीक्षा के अधिकार का उपयोग नरम दृष्टिकोण अपनाते हुए संवेदनशील तरीके से करना चाहिए।
द्विवेदी ने कहा कि ‘‘धार्मिक प्रथा से संबंधित कानून की पड़ताल करते समय अदालतों को अधिक कठोर होना पड़ेगा। जब तक किसी दुर्भावना, धर्म के नाम पर धोखाधड़ी का कोई मामला साबित न हो, तब तक अदालत को धार्मिक प्रथा के प्रश्न में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, खासकर तब जब इससे किसी को कोई नुकसान न हो रहा हो।’’
शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के सातवें दिन, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना होगा।
उन्होंने द्विवेदी से कहा, ‘‘आप यह नहीं कह सकते कि हम एक संप्रदाय के हैं और वे दूसरे संप्रदाय के हैं। वे एक मंदिर में नहीं आ सकते हैं और हम उनके मंदिर में नहीं जा सकते।’
उन्होंने द्विवेदी से कहा, ‘‘यह हिंदू समाज की अवधारणा नहीं हो सकती। यदि हिंदू पंथ अपने दरवाजे दूसरों के लिए नहीं खोलते, तो उन्हें नुकसान होगा।’’
वरिष्ठ वकील ने जवाब दिया कि वह इस विचार से सहमत हैं और उन्होंने कहा कि यदि कोई विशेष सम्प्रदाय दूसरों को उपासना करने से रोकता है, तो राज्य द्वारा बनाए गए कानून सामाजिक सुधार के तहत वैध माने जाएंगे।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25(2)(बी) इसलिए जोड़ा गया था क्योंकि उस समय समाज में छुआछूत और बहिष्कार जैसी बुराइयां मौजूद थीं, और इन्हें खत्म करना जरूरी था। इससे राज्य को यह अधिकार मिला कि वह सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बना सके, या फिर सार्वजनिक स्वरूप वाले हिंदू धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों के लिए खोल सके।
आज के दिन कई वरिष्ठ वकीलों ने आस्था और मौलिक अधिकारों के मुद्दे पर अपनी दलीलें पेश कीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमणियन की दलीलें सुनते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि जब राज्य सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है, तो इस संबंध में कोई सार्वभौमिक या व्यापक दिशानिर्देश निर्धारित करना कठिन होगा और इस बात पर जोर दिया कि ऐसे प्रश्न अनिवार्य रूप से प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेंगे।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुब्रमणियन से पूछा कि क्या सामाजिक सुधार के नाम पर शबरिमला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश की स्पष्ट अनुमति देने वाला एक राज्य कानून धार्मिक प्रथा का उल्लंघन होगा और क्या इसे वैध सुधार उपाय के रूप में मान्य माना जा सकता है।
वरिष्ठ वकील ने जवाब दिया कि ऐसे मामले में भी अदालत को यह सावधानीपूर्वक पड़ताल करनी होगी कि उस परंपरा की प्रकृति और आधार क्या है, तभी यह तय किया जा सकेगा कि राज्य का हस्तक्षेप वास्तव में सामाजिक सुधार है या नहीं और क्या किसी को बाहर रखना किसी पंथ की पुरानी परंपरा, रीति-रिवाज या प्रथा का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि न्यायपालिका को यह तय करने के लिए नहीं कहा जा सकता कि कोई धार्मिक प्रथा “अनिवार्य” है या नहीं।
सुनवाई बृहस्पतिवार को जारी रहेगी।
भाषा अमित माधव
माधव

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