दिल्ली दंगे: न्यायालय ने उमर व इमाम को जमानत नहीं देने को सही करार दिया, दो अन्य को अंतरिम राहत
दिल्ली दंगे: न्यायालय ने उमर व इमाम को जमानत नहीं देने को सही करार दिया, दो अन्य को अंतरिम राहत
नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली दंगों के दो आरोपियों अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को शुक्रवार को अंतरिम जमानत दे दी। इसके साथ ही न्यायालय ने इस साल की शुरुआत में कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने को उचित ठहराते हुए कहा कि ऐसा अनुच्छेद 21 को गौण मानते हुए नहीं, बल्कि उनकी भूमिका और आरोपी-आधारित आकलन के आधार पर किया गया था।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पीवी वराले की पीठ ने सैफी और अहमद को सशर्त छह महीने की अंतरिम जमानत दी। पीठ द्वारा दोनों आरोपियों पर लगाई गई शर्तों में मीडिया से बातचीत पर मनाही और मामले को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर रोक शामिल है।
न्यायमूर्ति कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2020 के दिल्ली दंगों के वृहद षड्यंत्र मामले में खालिद और इमाम की जमानत याचिका पांच जनवरी को खारिज कर दी थी। उक्त आदेश की इस सप्ताह शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ ने कड़ी आलोचना की थी।
न्यायमूर्ति कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि क्या लंबे समय तक कारावास और मुकदमे में देरी जमानत संबंधी वैधानिक प्रतिबंधों को रद्द कर सकती है, इस पर कानून के प्रश्न के लिए एक निर्णायक व्यवस्था की आवश्यकता है और इस मुद्दे को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया।
इसने कहा कि के.ए. नजीब मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले की समझ को लेकर विभिन्न पीठों के बीच ‘‘कथित मतभेद’’ था, जिसमें यह माना गया था कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामलों में लंबी कैद जमानत देने का आधार हो सकती है।
पीठ ने न्यायिक नैतिकता के कारण 18 मई को एक अन्य मामले में दूसरी पीठ द्वारा दिए गए फैसले पर टिप्पणी नहीं करने की बात कही और निर्देश दिया कि उचित पीठ के गठन के लिए मामले की फाइलें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखी जाएं।
पीठ ने कहा, ‘‘केए नजीब मामले में कानून को स्पष्ट करने के लिए, विशेष रूप से यूएपीए की धारा 43डी(5) के आवेदन के संबंध में, प्रधान न्यायाधीश द्वारा एक उपयुक्त पीठ का गठन करना आवश्यक है।’’
पीठ ने खुली अदालत में फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत मुद्दा केवल याचिकाकर्ताओं की जमानत की प्रार्थना से संबंधित संकीर्ण मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उचित संवैधानिक दृष्टिकोण से संबंधित है, जहां लंबी कैद और मुकदमे के निष्कर्ष में देरी को जमानत के आधार के रूप में पेश किया जाता है। हालांकि, इस फैसले को अभी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है।
पीठ ने कहा कि केए नजीब मामले में निर्धारित कानूनी अनुपात कम सदस्यों वाली पीठों के लिए बाध्यकारी नजीर है और गुलफिशा फातिमा (5 जनवरी) मामले में इसका विधिवत पालन किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘समान संख्या में सदस्यों वाली कोई समन्वय पीठ तीखी टिप्पणियां नहीं कर सकती और प्रभावी रूप से पिछली पीठ के फैसले को पलट नहीं सकती।’’
उसने कहा कि ‘‘कानून अक्सर तर्कपूर्ण मतभेदों के माध्यम से विकसित हुआ है, और समन्वय पीठ संदेह व्यक्त कर सकती है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘लेकिन जब तर्क की बात आती है, तो इसे आलोचना पर नहीं छोड़ा जा सकता।’’ उसने कहा कि समान सदस्यों वाली पीठ आपत्ति की भाषा से वह हासिल नहीं कर सकती जो कानून की घोषणा से कर सकती है।
पीठ ने कहा कि मतभेदों के मद्देनजर इस मुद्दे को अनिश्चितता की स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए, उचित संख्या वाले पीठ के समक्ष इस मुद्दे को रखना उसका कर्तव्य है।
पीठ ने कहा कि गुलफिशा फातिमा मामले में फैसला एकाकी अनुप्रयोग था और पांच जनवरी के फैसले में कहा गया कि देरी की जांच प्रासंगिक है और इसमें आरोपों की प्रकृति, कानून, कार्यवाही का चरण, मुकदमे की वास्तविक दिशा, देरी में योगदान देने वाले कारण, आरोपी को सौंपी गई भूमिका और प्रथम दृष्टया सामग्री को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पीठ ने दिन की शुरुआत में संकेत दिया था कि वह 2020 के दिल्ली दंगों के दो आरोपियों को संभवत: अंतरिम जमानत दे देगी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह दिल्ली पुलिस की इस दलील पर विचार करेगी कि यूएपीए मामलों में जमानत के कानूनी प्रश्न को एक वृहद पीठ के पास भेजा जाए, क्योंकि इस मामले पर विरोधाभासी विचार हैं।
दिल्ली पुलिस ने हालांकि दोनों आरोपियों की जमानत का यह कहते हुए विरोध नहीं किया कि वे मुख्य आरोपी नहीं हैं, लेकिन उसने अदालत से सवाल किया कि क्या अजमल कसाब को मुकदमे में देरी के आधार पर जमानत दी जा सकती थी।
दिल्ली पुलिस ने इस कानूनी प्रश्न को वृहद् पीठ के समक्ष भेजने का अनुरोध करते हुए पूछा कि क्या लंबे समय तक कारावास और मुकदमे में देरी के आधार पर यूएपीए जैसे आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जमानत पर वैधानिक प्रतिबंधों को रद्द किया जा सकता है।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने पीठ को बताया कि कसाब मामले (2008 के मुंबई आतंकी हमले का दोषी) में गवाहों की बड़ी संख्या के कारण मुकदमे में सात साल की देरी हुई। शीर्ष अदालत ने 18 मई को रेखांकित किया कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद है’’ केवल एक खोखला कानूनी नारा नहीं है। उसने खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने पांच जनवरी के फैसले पर सवाल उठाया।
उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) द्वारा जांच किए जा रहे ‘नार्को-आतंकवाद’ मामले में आरोपी हंडवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने पांच जनवरी को खालिद और इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि दोनों आरोपी एक साल बाद सुरक्षा प्राप्त गवाहों से जिरह के बाद नए सिरे से जमानत याचिका दायर कर सकते हैं।
भाषा
धीरज अविनाश
अविनाश

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