दिल्ली की आबोहवा तय कर रही है तपेदिक मरीजों के बचने के आसार: अध्ययन

दिल्ली की आबोहवा तय कर रही है तपेदिक मरीजों के बचने के आसार: अध्ययन

दिल्ली की आबोहवा तय कर रही है तपेदिक मरीजों के बचने के आसार: अध्ययन
Modified Date: August 6, 2026 / 06:17 pm IST
Published Date: August 6, 2026 6:17 pm IST

(वर्षा नेगी)

नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) एक बड़े महामारी-विज्ञान अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली में तपेदिक (ट्यूबरकुलोसिस) का इलाज करा रहे मरीजों के बारीक कणों वाले वायु प्रदूषण (पीएम2.5) के संपर्क में आने पर उनकी मौत का जोखिम बढ़ जाता है।

‘पीटीआई-भाषा’ को इस अध्ययन के कागजात मिले हैं । यह अध्ययन करने वालों का कहना है कि वायु प्रदूषण और तपेदिक से होने वाली मौतों के बीच संबंध का परीक्षण करने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा अध्ययन है।

इस अध्ययन में दिल्ली में सितंबर 2022 और अगस्त 2023 के बीच तपेदिक का इलाज आरंभ करने वाले 61,925 वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया गया।

बोस्टन यूनिवर्सिटी के ‘स्कूल ऑफ़ मेडिसिन’ के अनुसंधानकर्ता प्रणय सिन्हा ने कहा कि यह अनुसंधान भारत में अपनी तरह का पहला अध्ययन है ।

सिन्हा का कहना है कि उनकी जानकारी के हिसाब से वायु प्रदूषण और तपेदिक से होने वाली मौतों के बीच संबंध की जांच करने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा अध्ययन है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय तपेदिक संभाग और ‘साउथ एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ प्रमोशन’ के अनुसंधानकर्ताओं ने बोस्टन विश्वविद्यालय के बोस्टन मेडिकल सेंटर, कॉर्नेल विश्वविद्यालय, वर्जीनिया विश्वविद्यालय, फ्रांस के ‘हाइड्रोसाइंसेज मोंटपेलियर’ और नीदरलैंड के मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के साथ मिलकर यह अध्ययन किया।

निष्कर्षों से पता चला कि प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर उपचार के दौरान मृत्यु का जोखिम भी बढ़ गया। उपचार शुरू होने से पहले 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम पीएम2.5 के संपर्क में रहने वाले मरीजों की तुलना में, 40-80 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम2.5 के संपर्क में रहने वाले मरीजों में उपचार के दौरान मृत्यु का खतरा तीन प्रतिशत अधिक पाया गया।

अध्ययन के अनुसार 80-120 माइक्रोग्राम के संपर्क में आने वालों में मौत का यह खतरा बढ़कर 22 प्रतिशत, 120-160 माइक्रोग्राम के संपर्क में आने वालों में 31 प्रतिशत और 160 माइक्रोग्राम या उससे ज़्यादा के संपर्क में आने वालों में 66 प्रतिशत हो गया।

आसान शब्दों में कहा जाए तो, अध्ययन में पाया गया कि इलाज शुरू होने से पहले जिन मरीज़ों को सबसे ज़्यादा वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ा था, उनके मरने की आशंका साफ़ हवा में सांस लेने वाले मरीज़ों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा थी।

यह समझने के लिए कि क्या प्रदूषित हवा इलाज के नतीजों पर असर डाल सकती है, अध्ययनकर्ताओं ने भारत के राष्ट्रीय तपेदिक डेटाबेस ‘निक्षय’ का सहारा लिया, जिसमें इलाज करा रहे मरीज़ों की जानकारी दर्ज होती है।

उन्होंने इन रिकॉर्ड का मिलान पीएम2.5 के सैटेलाइट-आधारित अनुमानों से किया – ये हवा में मौजूद बहुत छोटे कण होते हैं जो इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में गहराई तक जा सकते हैं और यहां तक कि खून के बहाव में भी मिल सकते हैं।

टीम ने इलाज शुरू होने से पहले के 30 दिनों पर ध्यान दिया। सिन्हा ने कहा कि यह समय इसलिए चुना गया क्योंकि यह अक्सर बीमारी का सबसे खतरनाक चरण होता है।

उन्होंने कहा,‘‘तपेदिक से मौतें अक्सर शुरुआती दौर में होती हैं और इलाज शुरू होने से ठीक पहले के कुछ हफ़्ते बहुत खतरनाक होते हैं। इस समय बीमारी अपने चरम पर होती है और मरीज़ को इलाज से अभी तक कोई सुरक्षा नहीं मिली होती है। हमें उम्मीद थी कि उस दौरान प्रदूषण का सबसे ज़्यादा असर होगा, इसलिए हमने उसी समय पर ध्यान दिया।’’

भाषा राजकुमार पवनेश

पवनेश


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