विकास, संस्कृति का संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

विकास, संस्कृति का संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

विकास, संस्कृति का संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
Modified Date: April 12, 2026 / 11:15 pm IST
Published Date: April 12, 2026 11:15 pm IST

नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने रविवार को कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना का मार्गदर्शक सिद्धांत “विकास भी, विरासत भी” है, जो इस बात पर जोर देता है कि आधुनिक विकास और परंपराओं का संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

राधाकृष्णन ने कहा कि जब आधुनिक विज्ञान भाषा, आस्था और संस्कृति के साथ सामंजस्य में काम करता है, तो यह संरक्षण और सशक्तीकरण की एक शक्ति बन जाता है।

उपराष्ट्रपति ने “विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन- भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण” शीर्षक वाले सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जनजातीय समुदायों के पास अमूल्य पारंपरिक ज्ञान है जो जैव विविधता और वन संसाधनों के सतत उपयोग में सहायक है।

उन्होंने कहा, ‘‘सदियों से इन समुदायों ने भारत की प्राचीन संस्कृति, आस्था और सभ्यतागत विरासत को संरक्षित रखा है। जनजातीय क्षेत्रों में हरित आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं।”

उन्होंने जनजातीय समुदायों के डिजाइन, वस्त्र और रंग संयोजन में असाधारण कौशल की सराहना करते हुए कहा कि यह पीढ़ियों से संरक्षित है।

प्रमुख सरकारी पहलों पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ‘‘प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान’’ के तहत लगभग 7,300 किलोमीटर लंबी 2,400 से अधिक सड़कों और 160 से अधिक पुलों को मंजूरी दी गई है।

भाषा प्रशांत सुरेश

सुरेश


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