दिल्ली रेस क्लब पर बेदखली संकट, हजारों लोगों की रोजी-रोटी और घोड़ों का भविष्य अधर में

दिल्ली रेस क्लब पर बेदखली संकट, हजारों लोगों की रोजी-रोटी और घोड़ों का भविष्य अधर में

दिल्ली रेस क्लब पर बेदखली संकट, हजारों लोगों की रोजी-रोटी और घोड़ों का भविष्य अधर में
Modified Date: May 27, 2026 / 11:44 am IST
Published Date: May 27, 2026 11:44 am IST

(वर्षा सागी )

नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) दिल्ली रेस क्लब को खाली कराने संबंधी कानूनी लड़ाई तेज होने के बीच यहां स्थित ऐतिहासिक रेसकोर्स में रखे गए उच्च नस्ल के 250 से अधिक रेस घोड़ों और इस पर निर्भर हजारों लोगों की आजीविका पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा मंगलवार को दिल्ली रेस क्लब को जारी कारण बताओ नोटिस पर रोक लगाने संबंधी आदेश रद्द किए जाने के बाद स्थिति और अधिक अनिश्चित हो गई है। यह नोटिस लुटियंस दिल्ली स्थित 84 एकड़ परिसर से क्लब को बेदखल करने के प्रस्ताव से जुड़ा है।

क्लब में काम करने वाले कर्मचारियों ने बताया कि भीषण गर्मी को देखते हुए अप्रैल से अगस्त तक घुड़दौड़ प्रतियोगिताएं स्थगित रहती हैं और इस दौरान घोड़ों को विशेष रूप से तैयार अस्तबलों में रखा जाता है ताकि उन्हें दिल्ली की कठोर गर्मी से बचाया जा सके।

अस्तबल में काम करने वाले एक कर्मचारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘गर्मियों में घोड़ों को दौड़ाया नहीं जाता। अप्रैल से लगभग अगस्त तक उनकी विशेष देखभाल की जाती है क्योंकि इस दौरान परिस्थितियां काफी कठिन हो जाती हैं।’’

कर्मचारियों के अनुसार, रेस वाले घोड़ों की देखभाल चौबीसों घंटे की जिम्मेदारी है, जिसमें उनकी साफ-सफाई, नियंत्रित आहार, चिकित्सकीय देखभाल और लगातार निगरानी शामिल है।

एक प्रशिक्षक ने कहा, ‘‘ये घोड़े देखने में भले ही शानदार लगते हों, लेकिन बेहद संवेदनशील होते हैं। हल्की सी फिसलन भी उन्हें गंभीर रूप से घायल कर सकती है। इन्हें कहां ले जाया जाएगा? ये घोड़े बाहर अपने दम पर जीवित नहीं रह सकते।’’

उन्होंने कहा कि इन घोड़ों की हड्डियों की संरचना बेहद नाजुक होती है और प्रशिक्षण के दौरान मामूली दुर्घटना भी गंभीर चोट का कारण बन सकती है। उन्होंने कहा, ‘‘एक बार फिसलने से भी बाल जैसी महीन दरार आ सकती है। ये दूसरे घोड़ों की तरह सामान्य चारा नहीं खा सकते।’’

प्रशिक्षकों के मुताबिक, रेस के लिए फिट रखने हेतु घोड़ों को नियंत्रित आहार और विशेष वातावरण की जरूरत होती है। उनके लिए रोजाना पोषक तत्वों, विटामिन और खनिजों से युक्त विशेष भोजन तैयार किया जाता है।

कर्मचारियों ने बताया कि रेस वाले घोड़ों की देखभाल काफी महंगी होती है। उन्हें प्रतिदिन गहन देखभाल की जरूरत पड़ती है। उच्च नस्ल के एक घोड़े के रखरखाव पर हर महीने करीब 40 हजार रुपये या उससे अधिक खर्च आता है।

रेस क्लब को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने विशेष रूप से उन कर्मचारियों को झकझोर दिया है, जिन्होंने दशकों से यहां काम किया है और जिनके परिवार पूरी तरह इस पर निर्भर हैं।

अस्तबल के एक देखभालकर्ता ने बताया कि वह चार दशक से अधिक समय से घोड़ों के साथ काम कर रहा है। उसने कहा, ‘‘मैं 18 साल की उम्र से यहां काम कर रहा हूं। अब 42 साल हो गए हैं। मैं अस्तबल में काम करता हूं और इसी से मेरा घर चलता है।’’

रेसकोर्स के कई कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें सिर्फ नौकरी ही नहीं, बल्कि क्लब से जुड़ी अपनी पूरी जीवनशैली खत्म होने का डर सता रहा है।

प्रशिक्षक इरफान अली (50) ने पहले ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया था कि उनका परिवार छह पीढ़ी पहले औपनिवेशिक घुड़सवार सेना के साथ दिल्ली आया था और तब से घोड़ों से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे दादा ने मुझे शुरुआती प्रशिक्षण दिया। पहले मैंने सहायक के रूप में काम किया और फिर वर्षों तक प्रशिक्षण लेने के बाद प्रशिक्षक बना।’’

उन्होंने बताया था कि वह फिलहाल ऐतिहासिक रेसकोर्स में 13 रेस घोड़ों की देखभाल कर रहे हैं।

करीब दो साल पहले क्लब से जुड़े एक अन्य कर्मचारी ने कहा, ‘‘मैं स्थायी नौकरी की उम्मीद लेकर यहां आया था। अगर इस जगह के साथ कुछ हो गया तो मुझे समझ नहीं आएगा कि आगे क्या करना है।’’

दिल्ली रेस क्लब प्रशिक्षकों, जॉकी, ठेकेदारों, पशु चिकित्सकों, सफाईकर्मियों और अस्तबल कर्मचारियों सहित एक बड़े तंत्र को सहयोग देता है। क्लब के अधिकारियों के अनुसार, करीब 5,000 परिवार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रेसकोर्स पर निर्भर हैं।

केंद्र ने 13 मार्च को दिल्ली रेस क्लब को नोटिस जारी कर दावा किया था कि वह परिसर पर लगातार अनधिकृत रूप से कब्जा जमाए हुए है। केंद्र ने यह कहते हुए परिसर पर शांतिपूर्ण कब्जा मांगा था कि जमीन सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आवश्यक है।

इसके बाद अधिकारियों ने 17 अप्रैल को सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की और क्लब को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह बताने को कहा कि उसके खिलाफ बेदखली और अनधिकृत कब्जे के लिए हर्जाने की वसूली का आदेश क्यों न पारित किया जाए।

हालांकि, क्लब ने एकल न्यायाधीश की पीठ के समक्ष कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी थी। पीठ ने अंतरिम आदेश में संपदा अधिकारी को 30 जुलाई तक इस पर आगे कार्यवाही नहीं करने का निर्देश दिया।

केंद्र सरकार ने दावा किया है कि लोक कल्याण मार्ग स्थित 84.48 एकड़ भूमि के लिए क्लब के साथ वर्ष 1926 में किया गया पट्टा (लीज़) समझौता स्थायी प्रकृति का नहीं था और इसकी अवधि 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो गई थी।

केंद्र ने तर्क दिया कि चूंकि पट्टे की अवधि बढ़ाने के लिए कोई अतिरिक्त विस्तार नहीं दिया गया था, इसलिए भूमि पर क्लब का लगातार कब्जा अनधिकृत था और इसकी जांच सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत की जा सकती है।

भाषा मनीषा रंजन

रंजन

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