विभिन्न कालंखड और भूगोल में मां-बच्चे की छवियों को प्रदर्शित करती प्रदर्शनी

विभिन्न कालंखड और भूगोल में मां-बच्चे की छवियों को प्रदर्शित करती प्रदर्शनी

विभिन्न कालंखड और भूगोल में मां-बच्चे की छवियों को प्रदर्शित करती प्रदर्शनी
Modified Date: June 23, 2026 / 04:45 pm IST
Published Date: June 23, 2026 4:45 pm IST

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में इटली में बनी ‘माटेर मटुटा’ की तीन फुट से ऊंची मूर्ति, जिसमें गोद में एक बच्चा है, ठीक वैसी ही भावना जगाती है जैसी लगभग 2500 ईसा पूर्व की हड़प्पा संस्कृति की मात्र 7 सेंटीमीटर की मां और बच्चे की छोटी सी मूर्ति जगाती है।

इसी तरह, छठी शताब्दी ईसवी के उदयपुर की ‘स्कंद माता’ की छवि, जो अपनी कमर पर एक बच्चे को लिए हुए हैं, 15वीं शताब्दी के फ्लोरेंस से सैंड्रो बोत्तीचेली की मर्मस्पर्शी ‘मैडोना एंड चाइल्ड’ से बहुत अलग नहीं है।

सदियों, भूगोल और संदर्भों की दूरियों के बावजूद, यहां हुमायूं का मकबरा संग्रहालय में लगी ‘वन मदर, मैनी मदर टंग्स’ प्रदर्शनी में 27 कलाकृतियों का एक संग्रह मां और बच्चे की इसी चिरस्थायी छवि की पड़ताल करता है—जो मानव इतिहास के सबसे सार्वभौमिक दृश्य आख्यानों में से एक है।

इतालवी दूतावास सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी में मां और बच्चे की विभिन्न आकृतियों और छवियों को एक साथ प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्राचीन रोम में माटेर मटुटा की मूर्तियों से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप में ‘हारिती’ के चित्रण और पुनर्जागरण काल की मैडोना तक।

कला इतिहासकार और इस प्रदर्शनी के सह-क्यूरेटर नमन आहूजा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ये मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं और मातृत्व की विविध परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह छवि कभी-कभी एक जैसी दिख सकती है, लेकिन यदि आप इसके बारे में थोड़ा और गहराई से सोचें और अध्ययन करें, तो आपको एहसास होगा कि यह वास्तव में एक अलग धर्म, एक अलग पंथ या उप-पंथ की बात कर रही है। और यह वास्तव में इसे बहुत ही विविध तरीके से कर रही है।’’

आहूजा ने कहा, ‘‘इसी तरह आपको कई मातृभाषाएं (विविधताएं) मिलती हैं, जो एक ही तरह की छवि को देखने के एक सामान्य निर्देश के तहत एकजुट दिखाई देती हैं।’’

यह प्रदर्शनी विभिन्न भारतीय परंपराओं से प्रेरणा लेती है, जिनमें योगिनियां, सप्तमातृकाएं और पहली शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी की गैर-धार्मिक मातृका (मां) आकृतियां शामिल हैं।

यह प्रदर्शनी 16 अगस्त को समाप्त होगी।

भाषा

वैभव नरेश

नरेश


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